नग़मे जो गाये नहीं गए
वक़्त की धुन पे बजाए नहीं गए
फूल झरते रहे डालियों से
ज़ुल्फ़ों में सजाए नहीं गए
वक़्त की नज़र पड़ी ही नहीं
सफ़हे से उतरे तो उतर गए दिल से
उजड़े घर फिर बसाए नहीं गए
लाख कोशिशें हों मुक़द्दर से किसी की
पसीजा जो न वही लम्हा तो
किसी छाँव से बहलाए नहीं गए
अपनी भी ज़िद ही रही
हमें सूरज की थी दरकार
जुगनुओं से हम बहलाए नहीं गए
वक़्त आता है तो तन्हाइयाँ भी सजती हैं
जी उठते हैं हज़ार अक्सों में
वक़्त की छाँव से जो दोहराए नहीं गए
आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में गुरुवार 16 जुलाई, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंसुंदर , जीना इसी का नाम है ।
जवाब देंहटाएंWahhh
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर रचना
वाह बेहतरीन रचना
जवाब देंहटाएंवाह
जवाब देंहटाएंसभी का धन्यवाद
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