कभी दोस्त बन के आइए
जिगर में ही समाइये
कसक सी उठती है दिल में
यूँ न हमें आज़माइए
मीलों तक जो फैला
सहरा भला रास आता किसे
दिल में भर के बस थोड़ी सी वफ़ा
आँखों से जगमगाइए ,टिमटिमाइये
फ़िज़ाँ में रंग भरिए
गुलों को ही महकाइए
खिल जाएँगे सारे सब्ज़-बाग
ख़ुशबू-ए-अहसास संग लाइये
साजेदिल अजीब है
बस जरा सा गुनगुनाइए
बज उठती हैं धड़कनें
दिल को ही बजाइए , दोस्त बन के आइए


5 टिप्पणियां:
बेहतरीन रचना
वंदन
आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 9 सितंबर 2026 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
वाह
बेहतरीन
आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद
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