गुरुवार, 3 सितंबर 2026

दोस्त बन के आइए


कभी दोस्त बन के आइए 

जिगर में ही समाइये 

कसक सी उठती है दिल में 

यूँ न हमें आज़माइए 


मीलों तक जो फैला 

सहरा भला रास आता किसे 

दिल में भर के बस थोड़ी सी वफ़ा 

आँखों से जगमगाइए ,टिमटिमाइये 


फ़िज़ाँ में रंग भरिए 

गुलों को ही महकाइए 

खिल जाएँगे सारे सब्ज़-बाग 

ख़ुशबू-ए-अहसास संग लाइये 


साजेदिल अजीब है   

बस जरा सा गुनगुनाइए  

बज उठती हैं धड़कनें 

दिल को ही बजाइए , दोस्त बन के आइए 

5 टिप्‍पणियां:

मैं भी औरों की तरह , खुशफहमियों का हूँ स्वागत करती
मेरे क़दमों में भी , यही तो हैं हौसलों का दम भरतीं