बिरहन ने कोई अलख जगा रक्खी है
रात कटती नहीं सब्र भी टूटा नहीं
दिल के साज पे बाशिन्दों को
थपक कौन सी सुना रक्खी है
बिरहन ने कोई अलख जगा रक्खी है
हर लम्हा है रात का आख़िरी लम्हा
रात के कानों में यही कह कर
आहट सुबह की सजा रक्खी है
बिरहन ने कोई अलख जगा रक्खी है


