हम चल तो लेते इठला के मगर
कोई धरती फूलों वाली न हुई
फ़िज़ाएँ इत्र सी महकती तो रहीं
बस हवा ही मेहर वाली न हुई
खुल जाते हम दो-चार मुलाक़ातों में
कोई आँख चाहने वाली न हुई
चलना था साहिल तक हमको
और राह कोई भी सवाली न हुई
टेढ़े रहना था आँगन को
और चाल भी बस मतवाली न हुई
काँटों से हमने कर ली यारी
अब झोली भी अपनी ख़ाली न हुई
आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में सोमवार 27 एप्रिल, 2026
जवाब देंहटाएंको लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
नज़रिया बदलने की बात हुई !
जवाब देंहटाएंवाह!!!
जवाब देंहटाएंक्या बात..
बहुत सुन्दर गजल ।
वाह!! बहुत सुंदर
जवाब देंहटाएंआप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद
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