ये किसकी आहट पर दरवाज़े ने सिसकी ली है
ये किसकी याद ने आज फिर हिचकी ली है
कितनी बरसियाँ मना लीं ग़म की
गाहे-बगाहे फिर हवाओं ने दस्तक दी है
कौन उतरा है खरा उम्मीदों पर
ये तिलिस्म सी दुनिया भी अरमानों ने ढहा दी है
उतरीं हैं जब सफ़हों पर लफ़्ज़ों में ठहर कर
वीरानियों ने कितनी गुफ्तगू की है
क़िस्मत की चोटें,न मोहलत दें न मौक़ा ही दें
जो कर गुजरें सो कर गुजरें , हमने तो बस लीपा-पोती की है
आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में मंगलवार 20 अक्तूबर, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंबेहतरीन शायरी
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत धन्यवाद
हटाएंसुंदर सृजन!
जवाब देंहटाएंआभार
हटाएंबहुत बहुत धन्यवाद दिग्विजय सिंह जी , लिंक को शामिल करने का भी और अपनी पोस्ट को यही शीर्षक देने का भी 🙏
जवाब देंहटाएंवाह
जवाब देंहटाएंआभार
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