गुरुवार, 4 दिसंबर 2025

चार किताबें पढ़ कर

चार किताबें पढ़ कर हम-तुम , क्या विरले हो जाएँगे 

मिटा न पाए मन का अँधेरा, तो क्या उजले हो जाएँगे 


एक अना की ख़ातिर हम तुम ,लड़ लेते बेबात 

मार के डुबकी देखो अन्दर , कितने उथले हो जाएँगे 


कोई छोटा बड़ा न जग में ,

ढाई आखर प्रेम ही सच है ,बाक़ी सारे जुमले हो जाएँगे 


सीरत सदा महकती रहती 

ख़ुशबू का अन्दाज है अपना ,वरना नक़ली गमले हो जाएँगे 


जितना जियें , सच्चा जियें 

 भरपूर जियें , जी खोल जियें 

वरना कंगले हो जाएँगे 


लिखने वाले ने लिख डालीं तक़दीरें 

हम भी कुछ ऐसा लिख डालें , कुछ यादों में संभले रह जाएँगे 

वरना यादों की तस्वीर में हम-तुम धुँधले रह जाएँगे 

12 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द रविवार 07 दिसंबर , 2025 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!

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  2. लम्बे समय के बाद पढना हुआ आपको ... वैसी हो ताजगी ...

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    1. बहुत शुक्रिया , ब्लॉगवाणी जब से बंद हुई , ब्लॉगर्स की पोस्ट्स पढ़ने के लिए कोई कॉमन एग्रीगेटर था ही नहीं , अभी एक ये पाँच लिंक्स वाली पोस्ट शुरू हुई है और एक मंच नाम से ब्लॉग द्वारा अनुसरण किये गए ब्लॉग्स की लिस्ट जो साइड में प्रदर्शित है , बस वहीं से पढ़ने का लाभ उठाया जा रहा है ।

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  3. सीरत सदा महकती रहती
    बहुत खूब

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  4. सभी टिप्पणीकर्ताओं को हौसला बढ़ाने के लिए शुक्रिया

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  5. "यह कविता बहुत ही सुंदर रचना है, दिल को छू गई।"

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मैं भी औरों की तरह , खुशफहमियों का हूँ स्वागत करती
मेरे क़दमों में भी , यही तो हैं हौसलों का दम भरतीं