रविवार, 4 दिसंबर 2016

इक बेहतर कल का निर्माण चल रहा है

ये देश बदल रहा है , इतिहास रच रहा है 
गाँधी के सपनों का भारत , करवट बदल रहा है 

थोड़ी सी कस है खानी , थोड़ी सी परेशानी 
अपने हितों से बढ़ कर , पहचानो है देश प्यारा 
आओ हम आहुति दें , इक बेहतर कल का निर्माण चल रहा है 
ये देश बदल रहा है 

उग्रवाद , कालाबाजारी और जाली नोटों का धन्धा 
कर रहे थे प्रहार नींव पर ही ,भ्रष्टाचार से त्रस्त थे 
विमुद्रीकरण ही हल था , काला धन निकल रहा है 
ये देश बदल रहा है 

अब न पसारे हाथ कोई , न हों भूखे बच्चे गली-गली 
ओत-प्रोत हो मानवता , अच्छे दिनों का आगाज़ 
इक उजली सी  सुबह का सूरज निकल रहा है 
ये देश बदल  रहा है 

बुधवार, 1 जून 2016

सौदा खरा चाहिये

दिल के बदले दिल चाहिये
हमको सौदा खरा चाहिये

मुश्किल नहीं है बहुत
हमको रिश्ता सगा चाहिये

आहें ही बसती रहीं
दिल दुआ से भरा चाहिये

जी भर के रो लें मगर
तेरा काँधा जरा चाहिये

पतझड़ के मौसम में भी
दिल हमको खिला चाहिये 

लाइये , शेख जी लाइये 
हमको मौसम हरा चाहिये 


गुरुवार, 10 मार्च 2016

गुलाब सा चेहरा

गुलाब को उसके काँटों की वजह से मत छोड़ो 
अवगुणों की वजह से गुणों को मत छोड़ो 

गुजारा है जो वक़्त साथ-साथ , वो बोलता ही मिलेगा 
खुशबुएँ साथ-साथ चलती हैं ,
वरना दिल तन्हा ही मिलेगा 
सारी खरोंचें जायेंगी भर ,गुलाब सा चेहरा दमकता ही मिलेगा 

गुलाब को उसके काँटों की वजह से मत छोड़ो 
अवगुणों की वजह से गुणों को मत छोड़ो

रुकना नहीं है वक़्त ने ,ये तू भी देख ले 
हर आज बना कल , और कल का क्या वज़ूद 
जो चीज कीमती है , गई हाथों से यूँ फिसल 
भर ले उसे सीने में , खुशबू सा समां महकता ही मिलेगा 

गुलाब को उसके काँटों की वजह से मत छोड़ो 
अवगुणों की वजह से गुणों को मत छोड़ो







बुधवार, 7 अक्तूबर 2015

सफ़्हा-दर -सफ़्हा

ऐसे उठ आये तेरी गली से हम
जैसे धूल झाड़ के कोई उठ जाता है

यादों की गलियों में थे अँधेरे बहुत
वक़्त भी आँख मिलाते हुए शर्माता है

वक़्ते-रुख्सत न आये दोस्त भी
गिला दुनिया से भला क्या रह जाता है

लाये थे जो निशानियाँ वक़्ते-सफर की
रह-रह कर माज़ी उन्हें सुलगाता है 

अब मेरे हाथ लग गया अलादीन का चराग 
आतिशे-ग़म से भी अँधेरा छँट जाता है 

तय होता है लेखनी का सफ़र सफ़्हा-दर -सफ़्हा 
मील का हर पत्थर हमें समझाता है

शुक्रवार, 18 सितंबर 2015

देख के कितना है रन्ज रिश्ते में

तू न देख के कितना है रन्ज रिश्ते में अपने,
तू ये देख के क्या क्या है निभाया मैंने 
सारी दुनिया मिलती है किसे ,
टुकड़ों में मिली धूप को कैसे गले लगाया मैंने 

तू मुझसे जुदा ही नहीं है ,
कैसे समझाये कोई अपने ही जिगर को 
बोले जो कभी भी तुम सख़्त होकर ,
दरक गया कुछ तो कैसे सँभाला मैंने 

बेशक तू न देख पाये के ,
कितनी है रँगत तुझसे मेरी दुनिया में 
तू ये देखना के मुश्किल वक़्त ने हमें जोड़ा कितना 
तेरे चेहरे की इक-इक शिकन पर ,
सुख-चैन अपना सारा लुटाया मैंने 

रिश्तों की खूबसूरती एक-दूसरे को बर्दाश्त करने में है , निभाने में है 
तू ये देख के तकरार में भी है क्या-क्या तुझसे चाहा मैंने 
तू न देख के कितना है रन्ज रिश्ते में अपने,
तू ये देख के क्या क्या है निभाया 


शुक्रवार, 31 जुलाई 2015

दिल तक उतरती हुई नमी

और हाँ नैनीताल जैसे ज़न्नत , और अब विदा लेने का वक्त आ चला है ....

कोई मेरे हाथों से जन्नत को लिये जाता है 
मेरे ख्वाबों के फलक को , लम्हों में पिये जाता है 

घबरा के मुँह फेर लेती है आशना अक्सर 
अब ये आलम है के दिल दीवाना किये जाता है  

अपने ही शहर में मुसाफिर की तरह रहे हम 
अपनों के बीच ही कोई बेगाना किये जाता है 

खिड़की से घर में दाखिल होते अब्र के झुण्ड 
दिल तक उतरती हुई नमी से कोई ज़ुदा किये जाता है 

फिर न ये नज़ारे होंगे , न ये आबो-हवा 
दिल ही नादाँ है जो , नजरों से पिये जाता है 

बरसों-बरस फुर्सत न मिली , छूटने लगा जो शहर 
ये कौन है जो फिजाँ का मोल किये जाता है 

रविवार, 19 जुलाई 2015

हम तेरे शहर से चले जायेंगे

इतने साल इस शहर में बिता कर अब जाने का वक्त हो चला है , सँगी-साथियों से बिछड़ने का वक़्त …

हम तेरे शहर से चले जायेंगे 
कितना भी पुकारोगे , नजर न आयेंगे 

अभी तो वक़्त है , मिल लो हमसे दो-चार बार और 
फिर ये चौबारे मेरे , मुँह चिढ़ायेंगे 

भूल जाना जो कभी , दिल दुखाया हो मैंने तेरा 
इतने अपने हो , गैर की तरह क्यों दिल दुखायेंगे 

धूप ही धूप रही , सफर में अपने बेशक 
छाया तेरी भी कभी , हम न भूल पायेंगे 

ये दुनिया आबाद रही हमेशा , दोस्ती के रँगों में 
महफिले-यारों की सँगत , कहो किधर से लायेंगे