गुरुवार, 19 अगस्त 2010

चुप से दिखाने के लिये

कर रहा इन्कार आँसू भी... आँख में आने के लिये
चुक गया दरिया भी ...आतिशे-गम बुझाने के लिये

हो गये हैं ढीठ से ... चुप से दिखाने के लिये
मार कर पत्थर तो देखो ... हमको हिलाने के लिये

सैय्याद ने ले लिये पर ...गिरवी दिखाने के लिये
उम्मीद पर चलते रहो...बेपरों के हौसले आजमाने के लिये

रख छोड़े थे ताक पर...कितने ही नगमे भुलाने के लिये
पिटारी खोल कर बैठे हैं ...वही लम्हे भुनाने के लिये

लौट आये हैं वही दिन रात...हमको सताने के लिये
पुराने फिर वही किस्से... दिले-नादाँ दुखाने के लिये

घड़ों पानी तो डाला था ...जख्मे-दिल सहलाने के लिये
गड़े मुर्दे छेड़े किसने ...चिन्गारी यूँ सुलगाने के लिये