सोमवार, 26 जनवरी 2009

मुझे मात दे ऐ ज़िन्दगी

मुझे मात दे ऐ ज़िन्दगी , तेरी शह पे मैं मचल सकूं
मुझे मूक राहों के बदले में, वो मुकाम दे जो बदल सकूँ

यूँ तो चाहतों का सफर भी है और राहतों का असर भी है
कोई तो हो ऐसी डगर जो ,मैं वक्त बन पकड़ सकूँ

मेरी जुस्तजू का गुजर भी है और आशना का बसर भी है
मुट्ठी में कोई बयार दे ,जो ख्याल बुन जकड़ सकूँ

यूँ तो सीढियों का चलन भी है और पीढ़ियों का गगन भी है
सहराँ में कोई खुमार दे ,कि मैं फूल बन अकड़ सकूँ


कृप्या सुनने के लिये लिंक पर क्लिक करे ( स्तुति की आवाज़ में )
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गुरुवार, 22 जनवरी 2009

झंकार की इक कल्पना


सुन्दर सा ला तू पाहुना
ये है मेरा उलाहना

क्यूँ भूल बैठा है हमें
कुछ भी तुझ से छुपा ना


खुश रहतें हैं भुलावों में
कैसे जियें बता ना


आहट भी जिसकी लाती है
झन्कार की इक कल्पना


कैसे बता साकार हो
यथार्थ की वो अल्पना

पलकें बिछाए बैठे हैं
दस्तक तो दे खुशबू का वो फ़साना


दिल में सजा के रख लेंगे
कुदरत का वो नजराना , आशिआना

बुधवार, 14 जनवरी 2009

दिन ढलते ही


हाँ चुराई है मैंने रिदम नाजिम नकवी साहिब की एक ग़ज़ल ' सूरज हाथ से फिसल गया है , आज का दिन भी निकल गया है ' की | रिदम को शायद लय या ताल कहते हैं | और चुराई है गजल के पहले शेर की सोच | ग़ज़ल थोड़ी उदास बन पड़ी है | चाहती तो मैं भी हूँ ; सबेरे , पुरवाई और चहकने की बातें लिखूं | जो इस रंग से न गुजरा , उस रंग की अहमियत क्या जाने | तन्हाई में एक तड़प की गूँज होती है और हर मिलन में एक किलकारी होती है | खैर ग़ज़ल हाजिर है |



दिन ढलते ही , अहसास आया


आज भी सूरज गुजर गया है



मेरी तरह वो भी तन्हाँ है


आग है इतनी , पिघल गया है



बहके क़दमों , मय को कोसे


हसरत सारी निगल गया है



छूटा निवाला , वक़्त के हाथों


ख्वाब तो सारा बिखर गया है



दिन दिन कर ये ,इक युग बीता


जीवन हाथ से फिसल गया है



आस सँजोये , रोज नई सी


सफर आसमाँ के निकल गया है


सोमवार, 12 जनवरी 2009

गाते हैं तेरे हौसले

गाते हैं तेरे हौसले

गाता है धरती आसमान

गाते हैं तेरे मन प्राण

बोलती है आँखों की जुबान


माहौल में रचे बसे

मन की तहें खोलते

अबीर और हिना की तरह

रँग छोड़ते निशान


एक सिरा तेरे हाथ है

दूसरा आँधियों के पार

सूरज को मात देती

हौसले की ये मुस्कान


गाते हैं तेरे हौसले
गाता है धरती आसमान

धरती गगन को नापती

तेरे पँखों की उड़ान

बुधवार, 7 जनवरी 2009

तन्हाईयों से पूछा

मैंने तन्हाईयों से पूछा अक्सर

क्यों मेरे घर का पता है याद तुम्हें

कस के पकड़ा है मेरा हाथ

मैंने जब जब भुलाया है तुम्हें


जो डेरा डाले हो तुम

कैसे आयेगा जशने मुहब्बत

मेरे घर , मेरे पास कहो


सर माथे से लगाये हूँ तुम्हें

घर आये की मेहमाँ नवाज़ी

कर लूँ , तो चलूँ


तेरे लिए भी सजी है महफ़िल

तेरे हर गीत को मैंने

सीने से लगा , गुनगुनाया है

रविवार, 4 जनवरी 2009

अपने जैसे दिलों को दिल पहचान लेता है


दिल में जगह रख कर मिलते हैं फ़िर भी
क्यों साथ चलना इन्हें गवारा नहीं होता
आड़े आ जाती है आन , बान और शान
जिसका खोना या कम होना , इन्हें गवारा नहीं होता
_अपने जैसे दिलों को दिल पहचान लेता है
बड़ी मुश्किल से राहें साथ चलती हैं
राहों को सजा ले तू , राहों का ठिकाना नहीं होता
_वो जो जन्मों से प्यासे हैं
समा जाते हैं जानों में , राहों की रज़ा बनकर
रज़ाओं का ठिकाना नहीं होता
_मुसाफिरी है तेरी भी मेरी भी
हाथों में पकड़ ले हाथ , झूठे आसरे , आडम्बर
सहारों का भरोसा नहीं होता
अपने जैसे दिलों को दिल पहचान लेता है

शुक्रवार, 2 जनवरी 2009

चाँद उगा आसमान में

चाँद उगा आसमान में
मौसम सारा निखरा आया
मुट्ठी भर रोशनी लेकर
चाँदी-चाँदी बिखरा आया

उछलें हैं लहरें , मिलने को
सागर में यूँ तूफ़ान आया
टूटें न किनारे अरमाँ के
ऐसे ही ये मेहमान आया

दल-बल अपने साथ लिये
तारों की थाली भर लाया
चमकें हैं सितारे आंखों में
साजिश ये कैसी कर लाया