रविवार, 4 जनवरी 2009

अपने जैसे दिलों को दिल पहचान लेता है


दिल में जगह रख कर मिलते हैं फ़िर भी
क्यों साथ चलना इन्हें गवारा नहीं होता
आड़े आ जाती है आन , बान और शान
जिसका खोना या कम होना , इन्हें गवारा नहीं होता
_अपने जैसे दिलों को दिल पहचान लेता है
बड़ी मुश्किल से राहें साथ चलती हैं
राहों को सजा ले तू , राहों का ठिकाना नहीं होता
_वो जो जन्मों से प्यासे हैं
समा जाते हैं जानों में , राहों की रज़ा बनकर
रज़ाओं का ठिकाना नहीं होता
_मुसाफिरी है तेरी भी मेरी भी
हाथों में पकड़ ले हाथ , झूठे आसरे , आडम्बर
सहारों का भरोसा नहीं होता
अपने जैसे दिलों को दिल पहचान लेता है

2 टिप्‍पणियां:

  1. अपने जैसे दिलों को दिल पहचान लेता है

    सच कहा आपने ...

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत ही सही कहा आपने..अच्छा लगा पढ़ कर...

    उत्तर देंहटाएं

मैं भी औरों की तरह , खुशफहमियों का हूँ स्वागत करती
मेरे क़दमों में भी , यही तो हैं हौसलों का दम भरतीं