मंगलवार, 12 मार्च 2013

दिन की अहमियत

रात का मुँह देखा तो जानी दिन की अहमियत 
दिल जला कर ही सही , कलम की रौशनाई हुई 

लहरें ही तो होती हैं शान समन्दर की 
ज़िन्दा हैं तो हलचल है , वरना मुर्दों की बस्ती हुई 

रग-रग में समाया है अरमाँ बन कर 
ज़ुदा करते नहीं बनता , खूं जैसी पहचान हुई 

पकड़ लेता है कलम जब-जब समन्दर 
बह जाता है हर कोई , बौनों सी हस्ती हुई 

ज़िन्दगी होती है सहरा के किनारों में भी 
नमी सारी तप कर , सूरज की नजर हुई 

6 टिप्‍पणियां:

  1. आप की ये सुंदर रचना शुकरवार यानी 15-03-2013 की नई पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही है...
    आप के सुझावों का स्वागत है। आप से मेरा निवेदन है कि आप भी इस हलचल में आकर इसकी शोभा बढ़ाएं...
    सूचनार्थ।

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  2. लहरें ही तो होती हैं शान समन्दर की
    ज़िन्दा हैं तो हलचल है , वरना मुर्दों की बस्ती हुई .
    बहुत खूब

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  3. ज़िन्दगी होती है सहरा के किनारों में भी
    नमी सारी तप कर , सूरज की नजर हुई

    सुंदर भावपूर्ण चिंतन.

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  4. ज़िन्दगी होती है सहरा के किनारों में भी
    नमी सारी तप कर , सूरज की नजर हुई

    वाह! सच बहुत खूब लिखा है.

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  5. अहसास महसूस करने वाला मिला,सुकून मिला
    वरना जिन्दगी हमारी भी बस यूँ ही बसर हुई .....
    शुभकामनायें!

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मैं भी औरों की तरह , खुशफहमियों का हूँ स्वागत करती
मेरे क़दमों में भी , यही तो हैं हौसलों का दम भरतीं