रविवार, 30 सितंबर 2018

इन्तिहाँ कर ले

उठ रे मन कोई सुबह कर ले 
आतिशे-ग़म की इन्तिहाँ कर ले 
यूँ ही नहीं चल सकेगा आगे 
माथे में कोई उजाला भर ले 

राहें अँधेरी , दिन भी अँधेरे 
कैसे निभेंगे सुब्हो-शाम के फेरे 
कोई न कोई तो भुगतान होगा 
तू भी गम से किनारा कर ले 

जां पे रखेगा जो पत्थर कोई 
मुर्दा नहीं है हलचल तो होगी 
नदिया के पार किनारा कर ले 
तिनके का ही सहारा कर ले 

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (02-10-2018) को "जय जवान-जय किसान" (चर्चा अंक-3112) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 01/10/2018 की बुलेटिन, ये बेचारा ... होम-ऑटोमेशन का मारा “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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मैं भी औरों की तरह , खुशफहमियों का हूँ स्वागत करती
मेरे क़दमों में भी , यही तो हैं हौसलों का दम भरतीं