सोमवार, 2 मार्च 2009

कब दूर किनारा है

उफनी हुई नदिया है
और पार उतरना है
बिगड़ी हुई किश्ती है
धारों पे चलानी है

किश्ती की मरम्मत कर
तूफानों से बचानी है
नदिया का रुख देखो
किनारे सँग ले चलती है

विपरीत बहावों में
सँग -सँग भी तो बहना है
रस्सी को ढीला कर
मौका गंवाना है

किश्ती का दम देखो
सागर से बहाना है
चंचल सी लहरों सँग
अठखेलियाँ करना है

उफनी हुई नदिया है
कब दूर किनारा है

6 टिप्‍पणियां:

  1. उफनी हुई नदिया है

    और पार उतरना है

    बिगड़ी हुई किश्ती है

    धारों पे चलानी है
    बहुत खूब।

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  2. अच्छा प्रयास है. लिखती रहें, तो और सुपठनीय पढ़ने को मिलेगा.

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  3. बहुत सुन्दर भाव!! बेहतरीन!

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  4. बहुत ही अच्छा भाव आपकी कविता नजर आया । बेहतरीन रचना ।

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  5. बहुत सुन्दर रचना है. आगे बढ़ते जाना है.

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मैं भी औरों की तरह , खुशफहमियों का हूँ स्वागत करती
मेरे क़दमों में भी , यही तो हैं हौसलों का दम भरतीं