बुधवार, 11 नवंबर 2009

हर हिस्से की धूप तय है

मौसम भी क्या शय है
हर हिस्से की धूप तय है

करता है गुलशन जो बेमानी
पकड़ी जाती है नादानी

जीवन की ये कैसी लय है
छाया की प्यासी मय है

अजीब हादसा है बेनामी
मुँह छिपाए है गुमनामी

सरक जाने का भय है
धूप-छाया की कच्ची वय है

7 टिप्‍पणियां:

  1. जीवन की ये कैसी लय है
    छाया की प्यासी मय है

    अजीब हादसा है बेनामी
    मुँह छिपाए है गुमनामी...

    in panktiyon ne dil ko chhoo liya ........


    bahut hi khoobsoorat abhivyakti se saath ek bahut hi sunder kavita.....

    मेरी रचनाएँ !!!!!!!!!

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  2. जीवन की ये कैसी लय है
    छाया की प्यासी मय है
    bahut sundar baat kahi aapne ..badhiya likha hai

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  3. मौसम भी क्या शय है
    हर हिस्से की धूप तय है

    करता है गुलशन जो बेमानी
    पकड़ी जाती है नादानी
    शर्दा जी क्या कहू पूरी रचना ही लाजवाब है बधाई

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  4. शारदा बहिन जी!
    आपकी कविता के भाव बहुत सुन्दर हैं।
    मेंने भी एक मुक्तक लिखने का प्रयास किया है।

    धूप का आघात सहने के लिए सारी जमी है।
    गर्मियों में भी पहाड़ों मे जमी ठण्डी नमी है।
    कट गई है गीत-गज़लों मे मेरी यह जिन्दगी,
    किन्तु अब तक छन्द और लय में कमी है।।

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  5. बेहतरीन रचना
    maine apney blog pr ek lekh likha hai- gharelu hinsa-samay mile to padhein aur comment bhi dein-

    http://www.ashokvichar.blogspot.com

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  6. मुझे आपका ब्लॉग बहुत अच्छा लगा! बहुत सुंदर और भावपूर्ण कविता लिखा है आपने जो दिल को छू गई! हर एक पंक्तियाँ लाजवाब है!
    मेरे ब्लोगों पर आपका स्वागत है!

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  7. मौसम भी क्या शय है
    हर हिस्से की धूप तय है

    वाह शारदा जी - खूबसूरत लेखन।

    लेकिन आजकल तो किसको कितना धूप और कितनी चाँदनी मिले यह भी दिल्ली से तय होता है।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com

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मैं भी औरों की तरह , खुशफहमियों का हूँ स्वागत करती
मेरे क़दमों में भी , यही तो हैं हौसलों का दम भरतीं