शुक्रवार, 20 नवंबर 2009

कुछ भी नहीं पूछा है उसने

परछाइयों से लड़ बैठी हूँ
अब कोई मुझे बुलाये न

कुछ भी नहीं पूछा है तुमने
ये कोई मुझे बताये न

दरिया तो पार किया मैंने
अब साहिल पे अटकाये न

पतवारें तो होती बहाना हैं
दम अपना कोई भुलाये न

नहीं पछाड़ा मुझको दरिया ने
किनारे से कोई लड़ाये न

हाय कोई ढाल बनी होती
पानी पर कोई चलाये न

कुछ भी नहीं पूछा है उसने
परछाईँ सा कोई डराये न

8 टिप्‍पणियां:

  1. पतवारें तो होती बहाना हैं
    दम अपना कोई भुलाये न
    शारदा जी ,बहुत सुन्दर , बधाई

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  2. पूरी गजल ही शानदार है।
    हर शेर दाद का हकदार है!

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  3. हर एक शब्द लाजवाब रही । बहुत ही उम्दा रचना ।

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  4. पतवारें तो होती बहाना हैं
    दम अपना कोई भुलाये न ...

    आशा और उमंग भारती सुन्दर रचना है .........

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  5. परछाइयों से लड़ बैठी हूँ
    अब कोई मुझे बुलाये न
    Gahare bhavon se bhari aapki rachana bahut achhi lagi.
    Aap nainital se hai jaankar bahut achha laga.Mai bhi pauri se hun. Pahad bahut bhate hai mujhe.
    Hardik Shubhkamnayen.

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  6. भावनाएं शब्दों का रूप लेकर इसी तरह अयां होती रहें
    इसी कामना के साथ...
    शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

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  7. बहुत सुंदर और उत्तम भाव लिए हुए.... खूबसूरत रचना......

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  8. achhi ghazal hai. aap mere blog par aye achha laga. apka compliment bhi bhadiya hai. chetan

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मैं भी औरों की तरह , खुशफहमियों का हूँ स्वागत करती
मेरे क़दमों में भी , यही तो हैं हौसलों का दम भरतीं