सोमवार, 31 मार्च 2014

जी भर कर तुम जल कर देखो

एक आस का दिया जला कर , कितने फूल खिलाये हमने 
मैं ही नहीं हूँ कायल इसकी , दुनिया भर से जा कर पूछो 

दीवाली सी जगमग होती , तम से भरी रात भी देखो 
बाती सँग तेल भी सार्थक होता , जी भर कर तुम जल कर देखो 

और चमन में क्या करना है , सूरज की अपनी महिमा है 
रँग जाते हैं उस रँग में , जिसके सँग तुम चल कर देखो 

सदियों से होता आया है , अक्सर दुख का खेल यहाँ 
अन्तर्मन में न उतरे जो , ऐसा सौदा ले कर देखो 

खुशबू भला कहाँ छुपती है , आँखें कर देती हैं चुगली 
इन्द्रधनुष सा खिल उठता है , फलक की सीढ़ी चढ़ कर देखो 

8 टिप्‍पणियां:

  1. खुशबू भला कहाँ छुपती है , आँखें कर देती हैं चुगली
    इन्द्रधनुष सा खिल उठता है , फलक की सीढ़ी चढ़ कर देखो
    बहुत सुंदर रचना.

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (01-04-2014) को "स्वप्न का संसार बन कर क्या करूँ" (चर्चा मंच-1562)"बुरा लगता हो तो चर्चा मंच पर आपकी पोस्ट का लिंक नहीं देंगे" (चर्चा मंच-1569) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    नवसम्वत्सर और चैत्र नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    कामना करता हूँ कि हमेशा हमारे देश में
    परस्पर प्रेम और सौहार्द्र बना रहे।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. सदियों से होता आया है,अक्सर दुख का खेल यहाँ
    अन्तर्मन में न उतरे जो,ऐसा सौदा ले कर देखो ...

    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति...!

    RECENT POST - माँ, ( 200 वीं पोस्ट, )

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  4. बहुत सुंदर प्रस्तुति। मेरे नए पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा।

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  5. एक आस का दिया जला कर , कितने फूल खिलाये हमने
    मैं ही नहीं हूँ कायल इसकी , दुनिया भर से जा कर पूछो
    शारदा जी सुन्दर अभिव्यक्ति ..
    भ्रमर ५

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  6. वाह... उम्दा भावपूर्ण रचना...बहुत बहुत बधाई...
    नयी पोस्ट@भूली हुई यादों

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  7. प्रभावशाली प्रस्तुति
    आपकी रचना बहुत कुछ सिखा जाती है

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मैं भी औरों की तरह , खुशफहमियों का हूँ स्वागत करती
मेरे क़दमों में भी , यही तो हैं हौसलों का दम भरतीं