शनिवार, 11 जुलाई 2026

नग़मे


नग़मे जो गाये नहीं गए 

वक़्त की धुन पे बजाए नहीं गए 

फूल झरते रहे डालियों से 

ज़ुल्फ़ों में सजाए नहीं गए 


वक़्त की नज़र पड़ी ही नहीं 

सफ़हे से उतरे तो उतर गए दिल से 

उजड़े घर फिर बसाए नहीं गए 


लाख कोशिशें हों मुक़द्दर से किसी की 

पसीजा जो न वही लम्हा तो 

किसी छाँव से बहलाए नहीं गए 


अपनी भी ज़िद ही रही 

हमें सूरज की थी दरकार 

जुगनुओं से हम बहलाए नहीं गए 


वक़्त आता है तो तन्हाइयाँ भी सजती हैं 

जी उठते हैं हज़ार अक्सों में 

वक़्त की छाँव से जो दोहराए नहीं गए 

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026

धरती फूलों वाली

 

हम चल तो लेते इठला के मगर 

कोई धरती फूलों वाली न हुई 


फ़िज़ाएँ इत्र सी महकती तो रहीं 

बस हवा ही मेहर वाली न हुई 


खुल जाते हम दो-चार मुलाक़ातों में 

कोई आँख चाहने वाली न हुई 


चलना था साहिल तक हमको 

और राह कोई भी सवाली न हुई 


टेढ़े रहना था आँगन को 

और चाल भी बस मतवाली न हुई 


काँटों से हमने कर ली यारी 

अब झोली भी अपनी ख़ाली न हुई