रविवार, 28 जून 2009

दुनिया के मेले यूँ गए

दुनिया के मेले यूँ गए हमको तन्हाँ छोड़ कर
भीड़ के इस रेले में , जैसे कोई अपना न था

तन्हाई ले है आई ये हमें किस मोड़ पर
खुली आँखों की इस नीँद में , अब कोई सपना न था

चाँद माथे रख के टिकुली आ गया दहलीज पर
उसके सिवा अब रात का , अपना कोई खुदा न था

या खुदा इम्तिहाँ न ले , तू मेरा इस मोड़ पर
सिलसिला ये रात दिन का , जख्मों से जुदा न था

9 टिप्‍पणियां:

  1. चाँद माथे रख के टिकुली आ गया दहलीज पर
    बहुत खूब

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  2. "दुनिया के मेले यूँ गए हमको तन्हाँ छोड़ कर
    भीड़ के इस रेले में , जैसे कोई अपना न था"
    सुन्दर अभिव्यक्ति।
    आभार।

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  3. चाँद माथे रख के टिकुली आ गया दहलीज पर
    उसके सिवा अब रात का , अपना कोई खुदा न था
    waah
    waah
    har she'r umda lekin ye toh seedha kaleje me utar gaya....

    barmbar badhaai !

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  4. बहुत ही बढ़िय, भावों को एक धागे में समेट लिया है

    ----
    चाँद, बादल और शामगुलाबी कोंपलें

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  5. चाँद माथे रख के टिकुली आ गया दहलीज पर
    उसके सिवा अब रात का , अपना कोई खुदा न था


    bahut pyara likha hai, badhai.

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  6. या खुदा इम्तिहाँ न ले , तू मेरा इस मोड़ पर
    सिलसिला ये रात दिन का , जख्मों से जुदा न था
    बहुत ही बढ़िय, बहुत सुन्दर रचना है।बधाई।

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  7. बहुत अच्छा है.
    हम इस विषय में ज्यादा तो नहीं जानते लेकिन जितना भी जानते है,
    काफी अच्छा लिखा है. आपका ब्लॉग पढ़ कर मान प्रसन्न हो गया
    धन्याद
    आप ऐसे ही लिखती रहे और हम आपकी रचनाओं को यूँ ही पढ़ते रहें...................

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  8. चाँद माथे रख के टिकुली आ गया दहलीज पर
    उसके सिवा अब रात का , अपना कोई खुदा न था
    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति है बधाई

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मैं भी औरों की तरह , खुशफहमियों का हूँ स्वागत करती
मेरे क़दमों में भी , यही तो हैं हौसलों का दम भरतीं