गुरुवार, 29 जुलाई 2010

घर से मन्दिर की दूरी

घर से मस्जिद है बहुत दूर , चलो कुछ यूँ कर लें
चन्द रोते हुए बच्चों को हँसाया जाये
कुछ इसी तर्ज़ पर ( यूँ तो बहुत चुप रहती हूँ मैं , मगर मेरी लेखनी को सच बोलने की बीमारी है ) । .......

घर से मन्दिर की दूरी तय कर लें
चलो आज किसी का भी दिल न दुखायें

कर्म बन जाते हैं पूजा ही
जो किसी किस्मत को सँवार आयें

न फुर्सत है न चाहत ही है
कभी खुद से भी मिल आयें

भीड़ में भी तन्हा ही हैं
चन्द लम्हें किसी को सुन आयें

कितना बोलती है ये , चलो
यादों की गठरी को कहीं छोड़ आयें

15 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर....
    यही अहसास इन्सानित के लिए प्रेरणा देता है.

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  2. Aapki yah rachana pahle padhi thi...behad pasand aayi thi,aur isiliye yaad rah rah gayi!!

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  3. क्षमा जी , पहली दो पंक्तियाँ मशहूर शायर की हैं ...मेरी लिखी हुई ये पंक्तियाँ मैंने कुछ दिन पहले ही लिखी थीं , ब्लॉग पर नहीं पेश की थीं , मुझे लगता है ये हम सबके अन्दर की आवाज है जो पहले भी सुनी सुनी सी लगती है ।

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  4. कितना बोलती है ये , चलो
    यादों की गठरी को कहीं छोड़ आएं

    बिल्कुल सच कहा आप ने ,यादें कभी कभी बहुत परेशान करती हैं लेकिन अगर गठरी ही फेंक दी तो अच्छी यादों का क्या होगा?

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  5. Shardaji,yah rachana aapne mujhe alagse post kee thi! Chahe ham sabke andar ki baat ho ye,har koyi is tarah use shabdon me nahi dhaal sakta!!

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  6. शारदा जी
    नमस्कार !
    आप के ब्लॉग पे पहली बार आने का सौभाग्य मिला है , आप कि अच्छी अभिव्यक्ति पढ़ने को मिली साधुवाद,
    सादर

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  7. bahut achhi jagah chala aaya ....dhnyaywad jo aap mere blog par aaye .

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  8. कितना बोलती है ये , चलो
    यादों की गठरी को कहीं छोड़ आयें

    Waaah...Bahut khoob...
    Neeraj

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  9. sharda gee pahali bar aapki rachna ko padha..ea ea line man ko chhoo gayi..

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  10. न फ़ुर्सत है न चाहत है,क्भी ख़ुद से भी मिल आयें। सुन्दर शे"र अच्छी ग़ज़ल्।

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मैं भी औरों की तरह , खुशफहमियों का हूँ स्वागत करती
मेरे क़दमों में भी , यही तो हैं हौसलों का दम भरतीं