सोमवार, 11 अक्तूबर 2010

कितने साबुत और बचा क्या

चन्दा तेरा रूप पिऊँ क्या
दूर तू है तेरा साथ जिऊँ क्या

तू तन्हा दिन रात चला है
तेरी पीड़ है मुझसे जुदा क्या

मेरी आँख का आँसू चुप है
और भला खामोश सदा क्या

साथ साथ चलते हैं हम तुम
कितने साबुत और बचा क्या

तेरी मुसाफिरी बनी रहे
मेरा क्या है माँगूं क्या

मेरे गीतों में तू ही तू
ऐसा अपना नेह है क्या

दूर से दिखते मिलते हुए
धरती-अम्बर कभी मिले हैं क्या

पी लूँ चाँदनी चुल्लू भर
सफ़र में थोड़ा आराम क्या

सहराँ भी ले लेता दम-ख़म
तू भी बता, तेरी मर्जी क्या

मेरी आवाज में सुन सकते हैं _
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22 टिप्‍पणियां:

  1. वाह चंदा से उसकी मर्जी आज तक किसी ने नही पूछी होगी……………बेहद सुन्दर भावो का समन्वय्।

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  2. पी लूँ चाँदनी चुल्लू भर
    सफ़र में थोड़ा आराम क्या

    सहराँ भी ले लेता दम-ख़म
    तू भी बता, तेरी मर्जी क्या

    गजब कि पंक्तियाँ हैं ...

    बहुत सुंदर रचना.... अंतिम पंक्तियों ने मन मोह लिया...

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  3. शारदा जी,

    खुबसूरत रचना ...............कुछ शेर बहुत पसंद आये .........शुभकामनाये|

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  4. मेरे गीतों में तू ही तू
    ऐसा अपना नेह है क्या

    बहुत बढ़िया भावपूर्ण रचना ... आभार

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  5. मेरी आँख का आँसू चुप है
    और भला खामोश सदा क्या


    सुन्दर पंक्तियाँ !

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  6. तेरी मुसाफिरी बनी रहे
    मेरा क्या है माँगूं क्या...
    और...
    पी लूँ चाँदनी चुल्लू भर
    सफ़र में थोड़ा आराम क्या...
    शानदार पंक्तियां हैं...बधाई.

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  7. तू तन्हा दिन रात चला है
    तेरी पीड़ है मुझसे जुदा क्या

    Wah! Ye to ham me se bahuton kee peeda hai! Kitni sundartase pooree rachana me dard bayan hua hai!

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  8. दूर से दिखते मिलते हुए
    धरती-अम्बर कभी मिले हैं क्या
    यही तो शाश्वत प्रश्न हैं

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  9. छोटी बहर की सुन्दर रचना!
    --
    सहराँ भी ले लेता दम-ख़म
    तू भी बता, तेरी मर्जी क्या
    --
    पढ़कर अच्छा लगा!

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  10. दूर से दिखते मिलते हुए
    धरती-अम्बर कभी मिले हैं क्या
    जो दीखता है कहाँ होता है..
    सुन्दर रचना.

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  11. दूर से दिखते मिलते हुए
    धरती-अम्बर कभी मिले हैं क्या
    बेहद सुन्दर और कोमल एहसास.....
    regards

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  12. लेखन के लिये “उम्र कैदी” की ओर से शुभकामनाएँ।

    जीवन तो इंसान ही नहीं, बल्कि सभी जीव जीते हैं, लेकिन इस समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते कुछ लोगों के लिये मानव जीवन ही अभिशाप बन जाता है। अपना घर जेल से भी बुरी जगह बन जाता है। जिसके चलते अनेक लोग मजबूर होकर अपराधी भी बन जाते है। मैंने ऐसे लोगों को अपराधी बनते देखा है। मैंने अपराधी नहीं बनने का मार्ग चुना। मेरा निर्णय कितना सही या गलत था, ये तो पाठकों को तय करना है, लेकिन जो कुछ मैं पिछले तीन दशक से आज तक झेलता रहा हूँ, सह रहा हूँ और सहते रहने को विवश हूँ। उसके लिए कौन जिम्मेदार है? यह आप अर्थात समाज को तय करना है!

    मैं यह जरूर जनता हूँ कि जब तक मुझ जैसे परिस्थितियों में फंसे समस्याग्रस्त लोगों को समाज के लोग अपने हाल पर छोडकर आगे बढते जायेंगे, समाज के हालात लगातार बिगडते ही जायेंगे। बल्कि हालात बिगडते जाने का यह भी एक बडा कारण है।

    भगवान ना करे, लेकिन कल को आप या आपका कोई भी इस प्रकार के षडयन्त्र का कभी भी शिकार हो सकता है!

    अत: यदि आपके पास केवल कुछ मिनट का समय हो तो कृपया मुझ "उम्र-कैदी" का निम्न ब्लॉग पढने का कष्ट करें हो सकता है कि आपके अनुभवों/विचारों से मुझे कोई दिशा मिल जाये या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये! लेकिन मुझे दया या रहम या दिखावटी सहानुभूति की जरूरत नहीं है।

    थोड़े से ज्ञान के आधार पर, यह ब्लॉग मैं खुद लिख रहा हूँ, इसे और अच्छा बनाने के लिए तथा अधिकतम पाठकों तक पहुँचाने के लिए तकनीकी जानकारी प्रदान करने वालों का आभारी रहूँगा।

    http://umraquaidi.blogspot.com/

    उक्त ब्लॉग पर आपकी एक सार्थक व मार्गदर्शक टिप्पणी की उम्मीद के साथ-आपका शुभचिन्तक
    “उम्र कैदी”

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  13. तेरी मुसाफिरी बनी रहे
    मेरा क्या है माँगूं क्या
    wah ...

    bahut sunder rachna ...

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  14. बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है!
    या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता।
    नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
    नवरात्र के पावन अवसर पर आपको और आपके परिवार के सभी सदस्यों को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!

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  15. दूर से दिखते मिलते हुए
    धरती-अम्बर कभी मिले हैं क्या
    जो दीखता है कहाँ होता है..
    भावपूर्ण सुन्दर पंक्तियाँ

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  16. भाव बहुत सुन्दर हैं ,लेकिन पंक्तियों मे लय कहीं कहीं टूटती दिखाई देती है ।

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  17. ओह बेचारे चन्दा की व्यथा को आपनें खूब पहचाना ! आखिर को एक पीड़ित ही दूसरे की व्यथा को जानता है !
    बाकी की टिप्पणी शरद कोकास जैसी !

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  18. ख़ामोशी के पीछे इक उदासी आँख से आंसू चुरा रही है .....बधाई ....!!

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मैं भी औरों की तरह , खुशफहमियों का हूँ स्वागत करती
मेरे क़दमों में भी , यही तो हैं हौसलों का दम भरतीं