शुक्रवार, 31 अगस्त 2012

कोई कोट्ठे तों सूरज

इक्क इक्क दिन मेरा लक्ख लक्ख दा 
पाणी विच लह गया वे माहिया 
इक्क इक्क कदम मेरा मण मण दा 
दिल्ल भुन्जे ढह गया वे माहिया 

साथ अपणे दी तूँ कदर ना जाणी 
कन्न मेरे विच्च कोई कह गया वे माहिया 

सवा सवा लक्ख दी सी धुप्प सुनैरी 
कोई कोट्ठे तों सूरज लै गया वे माहिया 

जिन्हाँ राहाँ दी मैं सार ना जाणी 
ओन्हीं राहीं वे तूँ लै गया वे माहिया 

सलमे-सितारे खाबाँ दी चुनरी 
हत्थ तेरे विच्च , पन्ध किन्ना रै गया वे माहिया 

इक्क इक्क दिन मेरा लक्ख लक्ख दा 
पाणी विच लह गया वे माहिया 
इक्क इक्क कदम मेरा मण मण दा 
दिल्ल भुन्जे ढह गया वे माहिया

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा आज रविवार (2-09-2012) के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    सूचनार्थ!

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  2. सुंदर गीत.

    अच्छी प्रस्तुति शारदा जी.

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मैं भी औरों की तरह , खुशफहमियों का हूँ स्वागत करती
मेरे क़दमों में भी , यही तो हैं हौसलों का दम भरतीं