रविवार, 14 अक्तूबर 2012

कोई तारा नहीं

कोई तारा नहीं , जुगनू भी नहीं 
हसरतों की आँख मिचोली भी नहीं 

अँधेरी रात में क्या क्या खोया 
बूझने को पहेली भी नहीं 

हाथ को हाथ न सूझे जो 
शबे-ग़म में कोई सहेली भी नहीं 

तुम आ जाते तो अच्छा था 
ख़्वाबों की कोई रँगोली भी नहीं 

ज़िन्दगी मिट्टी का ढेर नहीं महज़ 
फूँकना जान कोई ठिठोली भी नहीं 

सो लेते हम भी घड़ी दो घड़ी 
दिल की लगी है ,चैन की बोली भी नहीं 

4 टिप्‍पणियां:

  1. वाह एक से बढ़कर एक पंक्तियाँ अति सुन्दर लाजवाब

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  2. कोई तारा नहीं , जुगनू भी नहीं
    हसरतों की आँख मिचोली भी नहीं ........
    सुंदर अभिव्यक्ति.........

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  3. तन्हाइया दर्द देती ही हैं .. सुन्दर प्रस्तुती

    मेरी नई पोस्ट पर आमंत्रित करता हूँ http://rohitasghorela.blogspot.in/2012/10/blog-post_17.html

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मैं भी औरों की तरह , खुशफहमियों का हूँ स्वागत करती
मेरे क़दमों में भी , यही तो हैं हौसलों का दम भरतीं