रविवार, 8 फ़रवरी 2015

ये सानिहा सा

वो आया तो ऐसे आया ,
जैसे हो साँझ का कोई झुटपुट साया 
हाथ से फिसला वही लम्हा ,
समझा था जिसे , जीने का सरमाया 

हमने देखे हैं गुलाब महकते हुए भी ,
काँटों पे चल के , ये हमने क्या पाया 
सजी हुई थी चाँद तारों की महफ़िल ,
फिर ये सानिहा सा क्यूँकर आया 

दाँव पर दिल ही लगा ,हर बार ,
किसके पास कभी कोई ,सिर के बल आया 
ज़िन्दगी धूप ही रही है , हमेशा 
छाया की फितरत को कब टिकते पाया 


6 टिप्‍पणियां:

  1. सार्थक प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (09-02-2015) को "प्रसव वेदना-सम्भलो पुरुषों अब" {चर्चा - 1884} पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. वाह बहुत खूब। बहुत ही शानदार रचना है।

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मैं भी औरों की तरह , खुशफहमियों का हूँ स्वागत करती
मेरे क़दमों में भी , यही तो हैं हौसलों का दम भरतीं