शुक्रवार, 28 मई 2010

आदमी की अना

चाहते हुए भी वो सब दिख जाता है , फिर लफ्जों में उतरना लाजिमी है ...

क़द से ऊँची है आदमी की अना
ऊँचाई पर भी बौना ही हुआ

नजर-अन्दाज़ करके करते हैं फना
अन्दाज़ कितना शातिराना हुआ

उसके मन की उपज , उसका समाँ
अपना मौसम है जुदा , मेल ही न हुआ

किस से पूछे सवाल अपनी आशना
उसकी आँख का पानी भी अजनबी हुआ

16 टिप्‍पणियां:

  1. सच्चे भावों को शब्दों की माला में पिरो दिया गया है
    ,
    क़द से ऊँची है आदमी की अना

    बहुत सटीक बात है

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  2. आप बहुत सुंदर लिखती हैं. भाव मन से उपजे मगर ये खूबसूरत बिम्ब सिर्फ आपके खजाने में ही हैं

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  3. क़द से ऊँची है आदमी की अना
    ऊँचाई पर भी बौना ही हुआ....fir se behtreen

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  4. सुन्‍दर शब्‍दों के साथ अनुपम प्रस्‍तुति, आभार ।

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  5. क़द से ऊँची है आदमी की अना
    ऊँचाई पर भी बौना ही हुआ.......
    किस से पूछे सवाल अपनी आशना
    उसकी आँख का पानी भी अजनबी हुआ.....

    अपनों के बेगानेपन के बारे में.......
    बहुत कुछ.....
    या जैसे सब कुछ बयान कर दिया आपने.

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  6. Zindagi jeeke use is tatasthtase dekhna yah bada fan hai...

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  7. किस से पूछे सवाल अपनी आशना
    उसकी आँख का पानी भी अजनबी हुआ

    sahi he

    badhai aao ko is ke liye

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  8. किस से पूछे सवाल अपनी आशना
    उसकी आँख का पानी भी अजनबी हुआ

    बिलकुल सच्ची बात ...

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  9. क़द से ऊँची है आदमी की अना
    ऊँचाई पर भी बौना ही हुआ ..

    सच है बहुत उँचाई पर जाने से सब बौने हो जाते हैं ..........

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  10. किस से पूछे सवाल अपनी आशना
    उसकी आँख का पानी भी अजनबी हुआ
    .....laajawab!
    Haardik shubhkamnayne

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  11. क़द से ऊँची है आदमी की अना
    ऊँचाई पर भी बौना ही हुआ .
    Bahut khoob.

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  12. बहुत सुंदर ग़ज़ल...मेरे ब्लॉग पर आने का शुक्रिया

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मैं भी औरों की तरह , खुशफहमियों का हूँ स्वागत करती
मेरे क़दमों में भी , यही तो हैं हौसलों का दम भरतीं