सोमवार, 17 जून 2013

न चेहरे की ढाल हुआ

मेहँदी घुल गई नस-नस में 
फिर भी रँग न गुलाल हुआ 

चढ़ते सूरज को नमन 
ढलता सूरज बेहाल हुआ 

मन की शिकन बोल उठे 
हाय क्या आदमी का हाल हुआ 

लीपा-पोती , रँग-रोगन 
न चेहरे की ढाल हुआ 

चलता-पुर्जा , ढीली-चूलें 
आदमी अब सिर्फ माल हुआ 

10 टिप्‍पणियां:

  1. चलता-पुर्जा , ढीली-चूलें
    आदमी अब सिर्फ माल हुआ,,,

    वाह,,, बहुत सुंदर गजल,,,

    RECENT POST: जिन्दगी,

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  2. लीपा-पोती , रँग-रोगन
    न चेहरे की ढाल हुआ--------

    वर्तमान के सच को उजागर करती रचना
    बहुत सुंदर
    बधाई


    आग्रह है मेरे ब्लॉग में भी सम्मलित हों
    पापा ---------



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  3. आपकी यह रचना कल मंगलवार (18 -06-2013) को ब्लॉग प्रसारण पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

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  4. आपके ब्लॉग पर देर से आने के लिए क्षमा

    लाजवाब रचना -- बधाई

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  5. चढ़ते सूरज को नमन
    ढलता सूरज बेहाल हुआ

    ...आज का यथार्थ...बहुत सुन्दर प्रस्तुति...

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  6. चढ़ते सूरज को नमन
    ढलता सूरज बेहाल हुआ
    Bas yahee haal to apna hai!Kya khoob likh dala aapne!

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मैं भी औरों की तरह , खुशफहमियों का हूँ स्वागत करती
मेरे क़दमों में भी , यही तो हैं हौसलों का दम भरतीं