रविवार, 1 फ़रवरी 2015

ज़िन्दगी का निशाँ

ऐ मुहब्बत मेरे साथ चलो  
के तन्हा सफ़र कटता नहीं   

 

दम घुटता है के
साहिल का पता मिलता नहीं   

जगमगाते हुए इश्क के मन्जर  

रूह को ऐसा भी घर मिलता नहीं 
 
  
तुम जो आओ तो गुजर हो जाए  

मेरे घर में मेरा पता मिलता नहीं 
 
  
लू है या सर्द तन्हाई है 

एक पत्ता भी कहीं हिलता नहीं  


ऐ मुहब्बत मेरे साथ चलो  

बुझे दिल में चराग जलता नहीं  
 

तुम्हीं तो छोड़ गई हो यहाँ मुझको  

ज़िन्दगी का निशाँ मिलता नहीं 

बुधवार, 21 जनवरी 2015

शहर-दर-शहर गुजरे

न बुलाओ हमें उस शहर में किताबों की तरह 
बयाँ हो जायेंगे हम जनाज़ों की तरह 

मुमकिन है खुशबुएँ जी उट्ठें 
किताबों में मिले सूखे गुलाबों की तरह 

जाने किस-किस के गले लग आयें 
हाथ से छूट गये ख़्वाबों की तरह 

यादों के गलियारे कहाँ जीने देते 
चुकाना पड़ता है कर्ज किश्तों में ब्याजों की तरह 

डूब जायेंगे हम आँसुओं में देखो 
न उधेड़ो हमें परतों में प्याजों की तरह 

चलना पड़ता है सहर होने तलक 
दिले-नादाँ शतरंज के प्यादों की तरह 

मुट्ठी में पकड़ सका है भला कौन 
शहर-दर-शहर गुजरे मलालों की तरह 



सोमवार, 12 जनवरी 2015

सदियों को दो आराम


जाओगे कहाँ कोई सत्कर्म करने तुम 
चेहरे पे खिला दो किसी के तुम कोई मुस्कान 
लो हो गया भजन , लो हो गया भजन

घर में हों गर माँ-बाप दादा-दादी से बुजुर्ग 
तन-मन से करो सेवा ,अपना जनम सफल 
खिल जायेगा उनकी दुआओं का चमन 
लो हो गया भजन , लो हो गया भजन

बन कर के किसी पेड़ से , तुम सह लो सारी घाम 
पथिकों को दो छाया , सदियों को दो आराम 
हर ठूँठ पर फूल उगाने का हो जतन 
लो हो गया भजन , लो हो गया भजन

अपने लिये तो जीता है , हर कोई देख लो 
रुकता है भला कोई काम ,क्या किसी के बिन 
जीवन को भी उपयोगी बनाने की हो लगन 
लो हो गया भजन , लो हो गया भजन

अन्दर है तेरे भी कोई नन्हा सा बच्चा देख 
खिलखिलाना चाहता है खुल के ,जो तू देख 
सहज सरल रह कर , कुछ भी नहीं कठिन 
लो हो गया भजन , लो हो गया भजन

बुधवार, 24 दिसंबर 2014

तुम्हारी आँखों में

तुम्हारी आँखों में हौसला चमकता बहुत है 
तुम्हारे आस-पास समाँ महकता बहुत है 

तुम्हें छू कर जो आतीं हैं हवाएँ 
इनकी नमी से अपनापन टपकता बहुत है 

तुम्हारे आ जाने से आ जाती है रौनक 
यादों की क्यारी में तुम्हारा चेहरा दमकता बहुत है 

तुम्हारी पलकों पर रक्खे हैं जो ख़्वाब 
कोई इनमें ही आ-आ के बहकता बहुत है 

तुम्हें देखूँ ठिठक जातीं हैं निगाहें 
ये मन किसी बच्चे सा चहकता बहुत है 

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2014

दो कदम चल के

मुझको इस दुनिया ने दिया भी तो क्या 
मेरी निष्ठा पर है सवाल लगा , कद्र-दाँ न मिला 
सारा गगन है झुका , ज़मीं है नहीं क़दमों तले 

सो गये नज़ारे भी , ख़्वाबों के सितारे भी 
दो कदम चल के , मेरे अरमान सारे भी
ये मोहताजी है क्यूँकर , भीड़ में तन्हा है जहान सारा ही 

इम्तिहान की घड़ियाँ , वक़्त से हारे भी 
हम तो हैं बेशक , सब्र के मारे भी 
किसे मिली है मन्जिल , दौड़ता रहता है जहान सारा ही 

रविवार, 30 नवंबर 2014

ऐसे हमको दो पर मौला

सपने ओढूँ ,सपने बिछाऊँ
मगर हकीकत से जी न चुराऊँ
कुछ ऐसी करनी कर मौला 
मेरी ज़िन्दगी में भी ,कोई रँग तो भर मौला 

कितना खोया , कितना पाया 
लाख सँभाला ,कहाँ टिक पाया 
चला-चली का मेला है बेशक 
मेरे हिस्से में भी , कोई रहमत तो कर मौला 

किसी ने दस्तर-खान बिछाया 
किसी ने पँखों को सहलाया 
लाख ज़ुदा हों अपनी राहें 
कोई फ़लक तो हमको मिला दे 
ऐसे हमको दो पर मौला 

शनिवार, 15 नवंबर 2014

वक़्त की नफ़ासत

है अदब भी फासले का दूसरा नाम 
होती है यूँ भी इबादत कभी-कभी 

जंजीरों की तरह रोक लेतीं हैं जो 
दीवारें भी बोलतीं हैं राहों की इबारत कभी-कभी 

चुप हो के भले बैठे दिखते हैं जो 
करते हैं वो भी बगावत कभी-कभी 

है आसाँ नहीं हवाओं का रुख मोड़ना 
करता है ज़मीर ही खिलाफत कभी-कभी 

लिखता है भला कौन ज़ुदाई के नगमे
चुभती है ये भी हरारत कभी-कभी 

चलता रहता है आदमी बिना सोचे-समझे 
अटका तो समझ आती है वक़्त की नफ़ासत कभी-कभी