मंगलवार, 2 जून 2015

हाल अपना क्यूँ सुनाएँ

लम्हों ने कीं ख़ताएँ 
सदियों ने पाईं सजाएँ 

सहर सी खिलीं फिज़ाएँ 
मरघट सी सूनीं खिज़ाएँ 

लफ़्ज़ों में क्या बताएँ 
हाल अपना क्यूँ सुनाएँ 

फूलों को जो दिखाएँ 
काँटों पे चल बताएँ 

ज़िन्दगी की हैं अदाएँ 
सहरां में फूल खिलाएँ 

बर्फ सी ठण्डी शिलाएँ 
चिन्गारी किस को दिखाएँ 

मंगलवार, 12 मई 2015

बगावत भी नहीं

उठते हैं दुआओं में जब हाथ मेरे 
लब हिलते ही नहीं 

टूटा है भरोसा मेरा 
अल्फ़ाज़ निकलते ही नहीं 

पड़ गये छाले हैं 
चला जाता ही नहीं 

है कैसा सफर ये 
सूलियाँ दिखती ही नहीं 

और जाऊँ भी किधर 
रूह का शहर मिलता ही नहीं 

नहीं बनना है तमाशा मुझको 
साबुत हूँ , आँख में पानी भी नहीं 

एक धीमा सा जहर उतरा है 
मेरी रगों में , बगावत भी नहीं 

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2015

दौड़े बहुत हो

आँतक-वाद की रोकथाम कैसे हो .....

बदले के बदले चलते रहेंगे 
खुदा बन के खुद को छलते रहेंगे 

थोक में बिछी लाशें , क्या सुख है पाया 
जो भी गया है ,लौट के न आया 
जख्मीं हैं सीने तो , मरहम लगाओ 
गूँजती सदाओं को , न तुम भुलाओ 
कब तक यूँ ख़्वाबों को मसलते रहेंगे 

कराहता है कोई , नजर न चुराओ 
सीने में उसको , न यूँ तुम दबाओ 
बहुत दिन हुए हैं , तुम्हें मुस्कराये 
दौड़े बहुत हो , नहीं पता पाये 
सहरा में कब तक भटकते रहेंगे 

बदले के बदले चलते रहेंगे 
खुदा बन के खुद को छलते रहेंगे 




रविवार, 29 मार्च 2015

हम सब हैं किताब

हम सब हैं किताब , पढ़ने वाला न मिला 
या खुदा ऐसा भी कोई ,चाहने वाला न मिला 

हाथ में हाथ लिये चलते रहे हम यूँ ही 
दूर तक कोई भी साथ निभाने वाला न मिला 

चलती रहती है सारी दुनिया यूँ तो दिल से 
फिर भी कोई पलकों पे बिठाने वाला न मिला 

गुनगुनाने के लिये चाहिये कोई तो फिजाँ 
वफ़ा के गीत कोई भी सुनाने वाला न मिला 

चाहिये ज़िन्दगी को कोई न कोई तो वजह 
बहाना कोई भी हमको चलाने वाला न मिला 

मंगलवार, 17 मार्च 2015

होली में मन रँग बैठी है

व्यस्तता की वजह से होली पर लिखा गीत होली के मौके पर पोस्ट नहीं कर पाई  ....

आँखें मलती उठ बैठी है , होली में मन रँग बैठी है 
एक उजास है अँगना में , चूनर अपनी रँग बैठी है 

सरक-सरक जाये है चुनरी ,गोरी खुद हल्कान हुई है 
दूर खड़े हैं कान्हा तब से , राधा जैसे मगन बैठी है 

हाथ गुलाल रँग पिचकारी , गुब्बारे भी दे-दे मारे 
बच्चे-बड़े हँसें किलकारी भर-भर,उम्र तो अल्हड़ बन बैठी है 

ले आया फागुन बौराई , मन को मिले ठाँव कोई न 
आँगन-आँगन रँग बरसे , उत्सव से भी ठन बैठी है 

भाँग-धतूरा नशा नहीं है , गले मिले बिन मजा नहीं है 
सिर चढ़ कर बोले ये जादू , होली-होली मगन बैठी है 

मीठी-मीठी तकरारों में , लाग-लपेट की मनुहारों में 
मौज-मस्ती की आड़ में देखो , रिश्तों की गरिमा बैठी है 



सोमवार, 23 फ़रवरी 2015

धूप हम भुला न सके

ये जो हाले-दिल तुम्हें हम सुना न सके
फासले दिलों के भी हैं ,जो मिटा न सके

तुम्हारे तरकश में तीर शब्दों के हैं
ज़ख्मी-जिगर निशाँ ,आज तक भुला न सके

उम्र भर पूछते रहे ज़िन्दगी का पता ही
फूल तेरी चाहत के ,अरमान खिला न सके   

धूप ही धूप उतर आई है शब्दों में 
छाया कितनी भी रही , धूप हम भुला न सके 

उँडेल कर रख दिया है सीना हमने 
जो तुम पढ़ न सके , हम पढ़ा न सके 

इक अदद दोस्त की तमन्ना ने हमें मारा है 
वरना ज़िन्दा थे हम भी ,क्यों गुनगुना न सके 

रविवार, 8 फ़रवरी 2015

ये सानिहा सा

वो आया तो ऐसे आया ,
जैसे हो साँझ का कोई झुटपुट साया 
हाथ से फिसला वही लम्हा ,
समझा था जिसे , जीने का सरमाया 

हमने देखे हैं गुलाब महकते हुए भी ,
काँटों पे चल के , ये हमने क्या पाया 
सजी हुई थी चाँद तारों की महफ़िल ,
फिर ये सानिहा सा क्यूँकर आया 

दाँव पर दिल ही लगा ,हर बार ,
किसके पास कभी कोई ,सिर के बल आया 
ज़िन्दगी धूप ही रही है , हमेशा 
छाया की फितरत को कब टिकते पाया