शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

तुम ही तुम हो

यूँ ही नहीं आते हैं जलजले 
धुरी से जमीं अक्सर खिसकी ही मिले 

परेशान है दुनिया सारी 
जाने किस दौड़ में शामिल सी ये लगे 

मुस्कुरा के जो चल दे अकेले ही 
आधार कोई उँगली पकड़े मिले 

नया नहीं है कुछ भी सूरज के तले 
नया तो वो है जो सह ले जिगर से चले 

चढ़ आती है धूप मुंडेरों पर  
धूप छाया की तरह जिन्दगी ही खिले 

तारीफ़ तुम्हारी , गिले भी तुमसे 
तुम ही तुम हो हमारे साथ चले 

शुक्रवार, 30 मार्च 2012

काँपते पत्ते सा वज़ूद

रीढ़ की हड्डी की बीमारी , ज़िन्दगी की रीढ़ तोड़ देती है । मजबूरी , इम्तिहान , हौसला है ज़िन्दगी का नाम ...जा तन लागे सो तन जाने ...जिस मन ने झेला ...बिस्तर से लगा न जाने कितनी मौतें मरा । ग़ालिब ने कहा है ...पड़िये गर बीमार तो ...न हो कोई तीमारदार । कहते हैं दुःख पकड़ कर नहीं बैठ जाना चाहिए ...देता है दर्द तो , देता है दवा भी ...इतनी भी नाइंसाफी वो कभी कर नहीं पाया । हमने कितने ही टूटे-फूटों को जुड़ कर फिर जिंदगी की रेस में शामिल होते हुए देखा है । निकल आयेंगे हम भी , सिर्फ वक्त के मेहरबान होने की देरी भर है ...फिर अपना अपना जोग है । वक्त ने कान में कुछ ऐसा कहा कि जीवनी-शक्ति की मुंदती हुई आँखें खुल गईं ।

न बदले दिन , न बदलीं तारीखें
मेरे खुदा ने क्यूँ मुझसे मुँह मोड़ा है

सूरज निकला है बड़े दिनों के बाद
ले आओ किरण को , उम्मीद ने मेरा साथ छोड़ा है

जिस्म की राह में काँटे , चुनने पड़ते हैं रूह को
ये कैसी डगर है , उम्र के पास भी दम थोड़ा है

किसे खबर है आँधियाँ ले जायेंगी किस तरफ
काँपते पत्ते सा वज़ूद , हवाओं ने रुख मोड़ा है

देता दिखाई कहाँ है वक़्त के उस तरफ
पकड़ ले हाथ कोई , डूबते ने तिनके को भी छोड़ा है

जरुरी तो नहीं के तेरी दुनिया का हिस्सा बनूँ
जितना जिऊँ ठीक-ठाक जिऊँ , आस ने दम तोड़ा है

कब से लिख रहे हो , कहा किसी ने कान में
जग गया कौन ,सोच की सिम्तों ने रोग से नाता तोडा है

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2012

झाँक के देखो तो ज़रा

वक़्त की शाख से टूटे लम्हे
टाँक के देखो तो ज़रा
टूटी है कोई डोर
झाँक के देखो तो ज़रा

पीले पत्तों की खनक
टोह के देखो तो ज़रा
ठहर जाती है खिजाँ
रोक के देखो तो ज़रा

किस्मत को नकारा
ढाँक के देखो तो ज़रा
ज़िन्दगी इतनी भी नहीं मेहरबाँ
भाँप के देखो तो ज़रा

नस-नस में बसा रावण
काँख में देखो तो ज़रा
खुदगर्जियाँ बनीं देहरी
लाँघ के देखो तो ज़रा

हिलते पानी की कहानी कहते
झाँक के देखो तो ज़रा
सारे पत्थर हैं या मरहम
आँक के देखो तो ज़रा

सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

तुम्हारे आने से



वैलेंटाइन डे में पवित्रता का रँग भरिये ...



मैंने पूजा की थाली से , प्रसाद सा पाया है तुम्हें
सर माथे से लगा कर , किसी दुआ सा अपनाया है तुम्हें

गुजर रही थी जिन्दगी यूँ ही
तुम्हारे आने से , सुरूर सा आया है हमें

चेहरा तुम्हारा यूँ भी अक्सर
हथेलियों में चाँद सा नजर आया है हमें

तन्हाइयों में भी साथी तुम हो
ज़ुदा चलना तुम से , कब रास आया है हमें

फूलों की बगिया से उठ कर
कौन आया है फिजाँ में , गुरूर आया है हमें

हाथों में उम्मीदों के दिए रक्खे
इश्क लौ सा जगमगाता हुआ , नजर आया है हमें

मैंने पूजा की थाली से , प्रसाद सा पाया है तुम्हें
सर माथे से लगा कर , किसी दुआ सा अपनाया है तुम्हें

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2012

तुम श्याम देख लेना

अँधेरे से जब मैं गुजरूँ
तुम श्याम देख लेना
ढूँढे से भी मैं पाऊँ
जब कोई किरण कहीं ना
तुम लाज मेरी रखना

तपतीं हैं मेरी राहें
साया न सिर पे पाऊँ
जब घाम से मैं गुजरूँ
तुम लाज मेरी रखना

विरहन सी मैं भटकती
टकराती फिर रही हूँ
जब श्याम वन से गुजरूँ
तुम लाज मेरी रखना

तुझको खबर रही है
नजरों से है क्यों ओझल
इस दौर से मैं गुजरूँ
विष्वास मेरा रखना

अँधेरे से जब मैं गुजरूँ
तुम श्याम देख लेना
ढूँढे से भी मैं पाऊँ
जब कोई किरण कहीं ना
तुम लाज मेरी रखना

शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

खिजाँ का मौसम

टूटे हुए दिल से भला क्या पाओगे
खिजाँ का मौसम किस तरह निभाओगे

इक कदम भी भारी है बहुत
जंजीरों में उलझ , न चल पाओगे

रुका है वक्त क्या किसी के लिए
सैलाब मगर ठहरा हुआ ही पाओगे

ठण्डी साँसें हैं पुरवाई नहीं
सहराँ की हवाओं में झुलस जाओगे

जीती-जागती बस्ती में मुर्दा है कोई
मरघट में हलचल का पता पाओगे

हमने चरागे-दिल से कहा
सहर तलक जलने की सजा पाओगे

परछाइयों से डरते हो
शबे-गम किस तरह निभाओगे

कतरा-कतरा ग़मों को पीना है
हलक से ज़िन्दगी कैसे उतार पाओगे

गुरुवार, 12 जनवरी 2012

मेरी बात और है

तुम जो चाहे सजा दे लो
मेरी बात और है , मैंने तो मुहब्बत की है

चाँदनी रात का भरम ही सही
दिल जला कर रौशनी की है

रूठ कर बैठा है मेरे घर में कोई
बन्द दरवाजों से मिन्नत की है

जिन्दगी यूँ भी गुजर जाती है
वीरानों से भी दोस्ती की है

हाले-दिल किस को सुनाने लगे
सजा में क्या कोताही की है

सह तो लेते हैं खुदा का करम
आदमी का करम , खुदा की मर्जी ही है

तुम जो चाहे सजा दे लो
मेरी बात और है , मैंने तो मुहब्बत की है