शनिवार, 11 अक्टूबर 2014

व्रत है या ये कोई पर्व है

आसमाँ में चन्दा ,झिलमिल तारों की छाया 
रात के अन्तिम पहर में जग कर 
बैठ सुहागन सर्घी करती
अन्न दही फल मेवा मिष्ठान और नारियल 
शगुनों भरी है थाली 
करवा-चौथ का व्रत है साजन
अपने प्रिय की है वो प्रेयसि 
नस-नस में रँग भरती 
  
निर्जल व्रत है , सोलह श्रृंगार कर 
सज-धज कर और थाली सजा कर 
सारी सुहागनें बैठ कथा हैं सुनतीं 
चाँद की पूजा करने के बाद ही 
मुँह में ग्रास वो रखतीं 
आशीर्वाद बड़ों से लेकर ,
सीने में खुशियाँ भरतीं 

व्रत है या ये कोई पर्व है 
रंगों भरा है मेला 
मन ही मन फिर कह उठतीं हैं 
जन्मों का है साथ सजनवा 
चलो पकड़ कर हाथ सजनवा 
अपने पिया की हैं वो सुहागन 
चाँद भी हामी भरता 
आसमाँ में चन्दा ,झिलमिल तारों की छाया 
आज का सारा उद्यम पिय के नाम वो करतीं 

बुधवार, 17 सितंबर 2014

गैर की तरह

उन्हें ये है ऐतराज़ के हम खुश रहते क्यूँ हैं 
घड़ी-घड़ी रह-रह के यूँ मुस्कराते क्यूँ हैं 

बड़ी मुश्किल से आये हैं इस मुकाम पर 
फिर पुरानी राह हमें वो दिखलाते क्यूँ हैं 

अपने सीने में भी धड़कता है दिल 
हो जा ज़िन्दगी से महरूम बतलाते क्यूँ हैं 

हमें मालूम है दुनिया का चलन 
गैर की तरह वो भी सितम ढाते क्यूँ हैं 

उन्हें मालूम नहीं ,वही मुस्कराते हैं सीने में 
मेरे चेहरे का रँग वही उड़ाते क्यूँ हैं 

सोमवार, 18 अगस्त 2014

ये चाहतों का सफर

ज़िन्दगी एक तन्हा सफ़र है गोया 
हर कदम राह में यार की उठता हो गोया 

उसके आने से महकता है समाँ 
उसकी मेहरबानी भी सँग-सँग हो गोया

करवटें बदलती रहती हूँ मैं 
नीँद उसको भी तो आ गई हो गोया

वक्त के बेरहम हाथों ने बख़्शा किसे 
हर सीने में नमी ही तैरती हो गोया

ये चाहतों का सफर ले आया है 
इक जँग खुद से भी छिड़ी हो गोया

वो मेरा दोस्त है तो दुश्मनी क्यूँ-कर 
दिए के साथ-साथ कोई हवा हो गोया

शुक्रवार, 27 जून 2014

मेरे लई ते राताँ ने सारियाँ

वे चन्ना , किस कम्म दिआं ऐ महल ते माड़ियाँ 
तेरे बाज्यों सब ने विसारिआं 
केहड़े पासेओं दिन ऐ चढ़दा 
मेरे लई ते राताँ ने सारियाँ 

सुंजियाँ मेरियाँ दिल दियाँ राहाँ 
देके विखाली लुक्क गया कोई 
टक्करां मारन अक्खाँ मेरियाँ 

रोंदी होई हस्स पैन्नी हाँ 
किस थां जावाँ रूह पुच्छदी ऐ 
पिंजर मेरा डोराँ तेरियाँ 

गम साथी ने घर मेरा तक्कया 
फुल्ल बहुतेरे खुशबू नदारद 
दुनियावी गल्लाँ मुक्क गइयाँ सारियाँ

वे चन्ना , किस कम्म दिआं ऐ महल ते माड़ियाँ 
तेरे बाज्यों सब ने विसारिआं 
केड़े पासेओं दिन ऐ चढ़दा 
मेरे लई ते राताँ ने सारियाँ 

मंगलवार, 6 मई 2014

पढ़े , तेरे खत फिर से

बरसों बाद पढ़े , तेरे खत फिर से 
वही मौसम गुजरा है , इक बार इधर फिर से 

वो जो धूप जमी थी, निगाहों के आस-पास 
तेरे चेहरे पे झिलमिलाती हुई , दिखी है इधर फिर से 

छोड़ आई थी जो पीछे , वो अल्हड़ सी जवानी 
जागी हैं वही नादानियाँ , देखो तो इधर फिर से 

रस्मों के सहारे से , महबूब बने तुम 
मेरी दुनिया दिल से , चली है इधर फिर से 

कौन जाने किसके खतों का , अन्जाम हो क्या 
दफ़न हों सीने में या जी उट्ठे ,लम्हा-लम्हा इधर फिर से 

दुनिया से छुपा कर , लिक्खा था जिन्हें 
फूल बन कर खिले हैं वही , महके हैं इधर फिर से 

गुरुवार, 1 मई 2014

तो अपना क्या होगा

हम तो तुम्हारी पलकों के ख़्वाबों में भी रह लेते 
तुम जो आँखों को तरेरोगे तो अपना क्या होगा 

ख़्वाब तो आसमाँ में उड़ाते हैं 
तुम जो ज़मीं पर ही उतारोगे तो अपना क्या होगा 

इरादों में हौसलों की चमक होती है 
तुम जो हकीकत को नकारोगे तो अपना क्या होगा 

बन्जारों की तरह तम्बू नहीं ताना हमने 
दिल की बस्ती को उजाड़ोगे तो अपना क्या होगा 

हम तो तुम्हारी पलकों के ख़्वाबों में भी रह लेते 
तुम जो आँखों को तरेरोगे तो अपना क्या होगा 


शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

बुत किसे होना पड़ा

काँटों पे सोना पड़ा 
फूलों को रोना पड़ा 

दिल की लगी देखो 
नींदों को खोना पड़ा 

सफर लम्हों का है 
सदियों को ढोना पड़ा 

दीदारे-खुदा के लिये 
हस्ती को खोना पड़ा 

जन्मों का मैला मन 
असुँअन से धोना पड़ा 

गँगा की पावन लहर 
आस का दोना पड़ा 

किसकी हथेली पे जाँ 
बुत किसे होना पड़ा