गुरुवार, 1 सितंबर 2011

महिवाल जवाब माँगे



दिल है तो कोई
गुलाब माँगे

धड़कने के बहाने
कोई ख़्वाब माँगे

आग के दरिया से
चुल्लू भर चनाब माँगे

इबारतें लिखने को
ज़ज्बा-ए-जुनूँ बेहिसाब माँगे

वक्त सदियों से
हिसाब माँगे

साहिल पे कच्चा घड़ा है
महिवाल जवाब माँगे

दिल है तो जाने
क्या क्या जनाब माँगे

शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

शबे-गम के इरादों की तरह जलो

जलो तो चरागों की तरह जलो
शबे-गम के इरादों की तरह जलो

किसने देखी है सुबह
आफताब के वादों की तरह जलो

कतरा कतरा काम आये किसी के
किसी काँधे पे दिलासे की तरह जलो

लगा के तीली रौशन हो जाये
सुलगते हुए सवालों की तरह जलो

हवा आँधी तूफाँ तो आयेंगे
टक्कर के हौसलों की तरह जलो

मिट्टी की महक वाज़िब है
खुदाओं के शहर में मसीहों की तरह जलो

मंगलवार, 2 अगस्त 2011

कौन खुशियों का तलबगार नहीं

कैसे कह दें के है इन्तिज़ार नहीं
कौन खुशियों का तलबगार नहीं

दिल वो बस्ती है जो दिन रात सजा करती है
न कहना के है कोई खरीदार नहीं

तुम्हीं तो छोड़ गई हो ऐ जिन्दगी यहाँ मुझको
तुम्हें गुरेज है हमसे प्यार नहीं

बदल गए हैं मायने कितने ही
तन्हाई भी है क्या गमे-यार नहीं

कर लेते हम हालात से समझौता
जीत है ये भी , है अपनी हार नहीं

उसकी बातों में बला का जादू है
यूँ ही दुनिया का दारोमदार नहीं

सोमवार, 18 जुलाई 2011

पंख दिए हैं मगर किस से कहें

तुम्हें इतना दिया है खुदा ने के तुम फख्र करो
मुझे भी दिया है मगर कुछ कमी सी है

पंख दिए हैं मगर किस से कहें
क्यों परवाज़ में कोताही सी है

लम्हें सिर्फ टंगे नहीं हैं दीवारों पर
माहौल में कुछ गमी सी है

आदमी आदमी को पहचानता कब है
अलग अलग कोई जमीं सी है

हाल मौसम का ही अलापते रहे उम्र भर
इसी राग में ढली कोई ढपली सी है

खिजाओं में है कौन फलता फूलता
गमे यार है सीने में नमी सी है

आ गए अलफ़ाज़ जुबाँ पर छुपते छुपाते
कलम की हालत भी हमीं सी है

न करें सब्र तो क्या करें
जिन्दगी की ये शर्त भी कड़ी सी है

शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

तेरे आने से

तेरे काँधे पे रखूँ सर और
जिन्दगी साजे-ग़ज़ल हो जाये

जिन्दगी कड़वी नहीं मीठी सी
किन्हीं दुआओं का फल हो जाये

यूँ ही कहते नहीं आफताब तुम्हें
तेरी आँखों की चमक मेरा नूरे-महल हो जाये

जिन्दगी यूँ भी बहुत मुश्किल थी
तेरे आने से बहारों को खबर हो जाये

कैसे कह दूँ के है इन्तिज़ार नहीं
तेरी साँसों की महक जिन्दगी का सबब हो जाये

किसने देखा शम्मा को बूँद बूँद मिटते हुए
जल के परवाना अमर हो जाये

सोमवार, 20 जून 2011

जलना शम्मा को अपने ही दम पड़े

क्षमा जी की नजर


यूँ न रूठो खुद से इतना ,
के मनाने ज़िन्दगी भी आये तो कम पड़े
आयेंगे हर मोड़ पे इम्तिहाँ लेने को गम बड़े

ज़िन्दगी के ख़जाने में साँसें गिनती की
कितनी पास हैं कज़ा के ,कितनी दूर हम खड़े

ज़िन्दगी अमानत है खुदा की
गौर से देखो कितने अक्सों में हम जड़े

ये नहीं है के छाया कभी देखी न हो
मन ही पागल है के इसके हिस्से ही गम पड़े

चलती रहती है यूँ ही सारी दुनिया
सो गए हम तो क्या सूरज भी थम पड़े

एक धागे का साथ जरुरी है
जलना शम्मा को अपने ही दम पड़े

उठो , अहतराम कर लो ज़िन्दगी का
जश्न से गुजरे तो भूल जायेंगे ख़म बड़े

मंगलवार, 14 जून 2011

सब फ़ानी ही लगे

जिन्दगी भी फ़ानी ही लगे
बारूद के ढेर पर कोई कहानी ही लगे

फूलों को बोना भी जरुर
काँटों में इनकी महक ज़िन्दगानी ही लगे

तोड़ कर तारे तो मैं ले आऊँ
जो मेरे हाथ कोई मेहरबानी ही लगे

न आए कोई तो क्या कीजे
दिल जलाना भी नादानी ही लगे

वक्त के हाथ हैं तुरुप के मोहरे
पत्तों की बाज़ी भी आसमानी ही लगे

भस्म कर देती है चिन्गारी भी
राख के ढेर तले आग पुरानी ही लगे

छाछ भी फूँक के ही पीता है
जले दूध के को सब फ़ानी ही लगे