मंगलवार, 6 दिसंबर 2011

ख़म का पता

जाने कब सूरज मेरे दरवाजे पे उगेगा
हसरतों की देहरी पर कोई फूल खिलेगा

क्यों नाराज होऊँ मैं इन्तज़ार की शब से
के अहले-सफ़र भी मुश्किल से कटेगा

स्याह अन्धेरे में किधर चलना है
सिम्तों का पता भी मुश्किल से मिलेगा

चलने को कोई बात भी चाहिए के
रौशनी को चरागे-दिल ही जलेगा

दम कितना है ख़्वाबों में क़दमों में
इस ख़म का पता भी सुबह ही चलेगा

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

सौगात

फूलों में उलझे तो पड़ते नहीं हैं पाँव ज़मीं पर
काँटों में उलझे तो , ज़मीं बचती ही नहीं है क़दमों तले

ज़िन्दादिली तो हिन्दी में भी छलकती है
ये वो भाषा है जो ज़रुरी है सीखने के लिये

बहुत चाहा कि लिखूँ खुशियों पर , हैरानियों पर
बेबसी , वीरानियों की सौगात हैं मेरी नज्में

है प्रीत जितनी गहरी , है टीस भी उतनी ही गहरी
जो चलाता है फूलों पर , वही छोड़ जाता है काँटों के बिस्तर कने

ज़िन्दगी जलाती है तो राख के ढेर में बचाती इतना
कलम कागज़ थमा कर , दुनिया भर को सुनाती अफ़साने अपने

रविवार, 20 नवंबर 2011

वक्त ने हमको चुना

वक्त ने हमको चुना
चोट खाने के लिये

मंज़िलें और भी हैं
राह दिखाने के लिये

कौन जीता है भला
गम उठाने के लिये

वक़्त आड़ा ही सही
साथ बिताने के लिये

रफू करना कला है
जिन्दगी बचाने के लिये

उधड़ गए तो सिले
गले लगाने के लिये

हिला रहा है कोई
हमको जगाने के लिये

उठो , अहतराम कर लो
ताल मिलाने के लिये

शुक्रवार, 11 नवंबर 2011

अदब के शहर में ( लखनऊ के लिये )

बच्चों की किसी फ्रेंड ने फेसबुक पर लिखा ...मुस्कुराइए के ये लखनऊ है ...बस यहीं से इस रचना का जन्म हुआ ....


मुस्कुराइए के ये अदब है
अदब के शहर में अदब से पेश आइये

ये वो शहर है , अजनबी भी
लगता अपना सा ही , जान जाइए

मुहब्बतों में नहीं होता तेरा मेरा
सुकून दिल का पहचान जाइए

मन्जिल भी सबकी एक ही है
राहों का पता जान जाइए

वफ़ा की वादियों में चलना है
तहज़ीबे-इश्क पर परवान जाइए

गुलाबी रँगत है , तहज़ीबे गँगा-जमनी
झुका के सर कुर्बान जाइए

आए हैं सैर को नवाबों के शहर में
गुलाबों की तरह यूँ मुस्कुराइए

लगा के देखिये चेहरे पे दो इँच चौड़ी मुस्कान
जिगर में उतर कर , राह चलतों को अपना बनाइये


बुधवार, 2 नवंबर 2011

छाया का गिला है

अपने जैसा कोई
नहीं मिला है

सुख की कोई
आधार शिला है

हर कोई तन्हा
बहुत हिला है

किस काँधे पर
आराम मिला है

चिन्गारी है
आग सिला है

धूप है हर सू
छाया का गिला है

दिल दहला और
मौसम खिला है

सदियों से सुख-दुख
का सिलसिला है

शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2011

रँग होता तो बिखरता भी

रँग होता तो बिखरता भी
जुनूँ होता तो झलकता भी

आओ कोई तो बात करें
गुफ्तगू में वक्त गुजरता भी

नजदीकियों की कहें
करीब हो जो , झगड़ता भी

मजबूर है आदत से परिन्दा
आसमाँ का हाथ पकड़ता भी

आफ़ताब दूर सही
धरती पर कोई चमकता भी

बहाने लाख करे
पहलू में दिल धड़कता भी

रूप दुगना होता
इश्क मय सा छलकता भी

रँग होता तो बिखरता भी
जुनूँ होता तो झलकता भी



यहाँ सुन सकते हैं ....
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रविवार, 9 अक्टूबर 2011

अहसास की कहन

जिसे जी कर लिखा हो वो छन्द कैसे हो
आड़े टेढ़े रास्ते पर चल कर सिर्फ मकरन्द कैसे हो

जिन्दगी फूलों सी भी हो सकती है
मगर काँटों की चुभन मन्द कैसे हो

अशआर पकड़ते हैं जब जब कलम
अहसास की कहन चन्द कैसे हो

दिया बुझे या जले दिले-नादाँ का
राख तले शोलों की अगन बन्द कैसे हो

गाने लगते हैं सुर में जब जब दर्द-औ-गम
इक सदा गूँजती है मगर दिल बुलन्द कैसे हो

फलसफे जिन्दगी के दिनों-दिन आते हैं समझ
छाले क़दमों तले जुबाँ पे मखमली पैबन्द कैसे हो