सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

हसरतों की देहरी पर

हसरतों की देहरी पर तुम
पाँव रखना सोच कर


है कहाँ आसान इतना
आना अपना लौट कर


है बहुत मगरूर इंसाँ
दिल लगाना सोच कर


लग गया जो दिल तो फिर
निभाना सीना ठोक कर


बेवफा निकलें जो सपनें
ये भी रखना सोच कर


होगा कहाँ अपना ठिकाना
खुद को पूछो रोक कर


मन्जर भी हैं मंजिल ही
देखो तो ये सोच कर


सफ़र के सजदे में तुम
सिर झुकाना , माथा ठोक कर

रविवार, 26 सितंबर 2010

इतना चुप हो जाऊँ

इतना चुप हो जाऊँ
कि बुत हो जाऊँ

तराशे गए हैं अक्स भी
मैं भी सो जाऊँ

सर्द आहों से पलट
जमाने की हवा हो जाऊँ

रूह को छू ले जो
रकीबों सी दुआ हो जाऊँ

कब बदलता है कोई
मैं ही काफिर हो जाऊँ

दर्द किसको नहीं होता
जुदा जिस्मो-जाँ हो जाऊँ

मंगलवार, 21 सितंबर 2010

क्या-क्या पास हमारे निकले


कोई शुबहा कहीं नहीं है
रात हुई और तारे निकले

अरमाँ की गलियों में यूँ ही
हम अपना दिल हारे निकले

कोई मंजिल कहीं नहीं है
टूट के बिखरे सितारे निकले

बाँध सके जो हमको देखो
झूठे सारे सहारे निकले

अपनी चादर में फूलों के
काँटों से ही धारे निकले

डूबें कैसे बीच भँवर में
दूर बहुत ही किनारे निकले

उँगली पकड़ेंगे वो अपनी
ऐतबार के मारे निकले

पराई धड़कन , पराई साँसें
क्या-क्या पास हमारे निकले

सोमवार, 13 सितंबर 2010

दम बड़ा लगता है


इसे जरा ' प्यार का पहला ख़त लिखने में वक्त तो लगता है ' की तर्ज पर गुनगुनाएँ ...


उधड़े रिश्ते सिलने में वक्त तो लगता है
बिखरे तिनके चुनने में वक्त तो लगता है

उलझ गए हैं मन के धागे
सुलझाने में , रेशमी गाँठें फिर खुलने में वक्त तो लगता है
बिखरे तिनके चुनने में वक्त तो लगता है

बिखर गए जो अरमाँ अपने
उजड़ी बस्ती , वीराने को फिर बसने में वक्त तो लगता है
बिखरे तिनके चुनने में वक्त तो लगता है

प्यार का पहला ख़त ये नहीं है
बिखरी उमंगें , फिर चुनने में दम बड़ा लगता है
बिखरे तिनके चुनने में वक्त तो लगता है

उधड़े रिश्ते सिलने में वक्त तो लगता है
बिखरे तिनके चुनने में वक्त तो लगता है

रविवार, 5 सितंबर 2010

छूटे न अपनी आस का झाला

चुक जाये जब सब्र का प्याला
कैसे मैं पी लूँ फिर हाला


यहाँ नहीं है कोई मीरा
और नहीं है कृष्ण रखवाला


दुख की रात बहुत लम्बी है
और पड़ा है जुबाँ पे ताला


किसने अपना धर्म है छोड़ा
सूरज ,चन्दा ,गगन मतवाला


हम भी आये हैं मन रँग कर
और ओढ़ कर एक दुशाला


जोग ,रोग ,सोग भोग कर
छूटे न अपनी आस का झाला


प्यास सभी को उसी घूँट की
जैसे जीवन हो मधुशाला

शनिवार, 28 अगस्त 2010

जब भी लय छूटे

टूटती है लय तो होती है धमक
ताल मिलाती लय भी चलेगी कब तक

हड्डियों में रच बस गया है जो
धुआँ वजूद का हिस्सा है तपेगा कब तक

तन ने कहा ही नहीं मन ने जिया जिसको
कलम के जिम्मे ये सफ़र बतलाओ कब तक

हदें मिटती हैं तो सरहदें टूटती हैं
खानाबदोशों की तरह गम खायेगा कब तक

खुशबुएँ दूर से ही लगतीं अच्छी
ख्यालों में तितलियों को पकड़ पायेगा कब तक

तान टूटे जब भी लय छूटे
जिन्दगी गीत है हर हाल में मुस्कराएगा कब तक


कलम की जगह किसी किसी के लिये अश्कों के जिम्मे भी हो सकता है ये सफ़र !

गुरुवार, 19 अगस्त 2010

चुप से दिखाने के लिये

कर रहा इन्कार आँसू भी , आँख में आने के लिये
चुक गया दरिया भी , आतिशे-गम बुझाने के लिये

हो गये हैं ढीठ से , चुप से दिखाने के लिये
मार कर पत्थर तो देखो , हमको हिलाने के लिये

सैय्याद ने ले लिये पर , गिरवी दिखाने के लिये
उम्मीद पर चलते रहो , बेपरों के हौसले आजमाने के लिये

रख छोड़े थे ताक पर , कितने ही नगमे भुलाने के लिये
पिटारी खोल कर बैठे हैं , वही लम्हे भुनाने के लिये 

लौट आये हैं वही दिन रात , हमको सताने के लिये
पुराने फिर वही किस्से , दिले-नादाँ दुखाने के लिये

घड़ों पानी तो डाला था , जख्मे-दिल सहलाने के लिये
गढ़े मुर्दे छेड़े किसने , चिंगारी यूँ सुलगाने के लिये