गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

सोच के दीप जला कर देखो


दूर गगन में जा कर देखो

सोच के दीप जला कर देखो


चन्दा तो उतना ही हँसी है

जितने पँख लगा कर देखो


उडती पतंगें मौजों सी ही

गीत सुहाने गा कर देखो


जीवन आनी जानी शय है

कोई तो अलख जगा कर देखो


रुत बदले , मिजाज भी बदले

वक्त से ताल मिला कर देखो


मरघट सी सूनी ख़ामोशी

क़ैद से बाहर कर देखो


बच्चे बूढ़े जवाँ हो जाते

आस का फूल खिला कर देखो


घर भर को रौशन कर देता

एक दिया ही जला कर देखो

मंगलवार, 23 नवंबर 2010

क्यूँ कोई सुखनवर न हुआ


दिल तो भरा है बहुत
बोला मगर कुछ भी न गया

आहटें सुनीं तो बहुत
मुड़ के देखा न गया

क़ैद में कौन हुआ
फासला जो मिटाया न गया

सूरज तो उगा
मेरे घर में दिन न हुआ

नब्ज तो देखी बहुत उजाले की
रोग का इल्म न हुआ

जिन्दगी दोस्त है तो
क्यूँ कोई सुखनवर न हुआ

वायदा खुद से कर के भूल गए
वो गया तो क्या क्या न हुआ

गुरुवार, 11 नवंबर 2010

तंग थी दिल की गली

कैसे आई ये खिजाँ , दिल्लगी होती रही
तंग थी दिल की गली , रौशनी होती रही

करता है जर्रे को खुदा , इश्क की फितरत रही
दिल से उतरे बिखरे जमीं पर , दिल की लगी रोती रही

है तन्हाई दोनों तरफ , अजब ये किस्मत रही
पास हो या दूर दिलबर , रुसवाई ही होती रही

साथ चलते चार दिन जो , पर दिलों में वहशत रही
लौट कर आए नहीं , जेहन दिन वही ढोती रही

कैसे आई ये खिजाँ , दिल्लगी होती रही
तंग थी दिल की गली , रौशनी होती रही

गुरुवार, 4 नवंबर 2010

मनों अँधेरा खदेड़ते नन्हें से चिराग

चरागों से सीखें जलने का सबक़
दिलों के बुझने का भी तो सबब जानें

ये जल तो लेते हैं एक दूसरे से
अन्धेरा अपनी तली का न पहचानें

परवाह करते हैं सिर्फ अपनी ही नमी की
दूसरा चुक रहा है ये हैं अन्जाने

चरागे-दिल से रौशन होती दुनिया
स्याह रातों का खुदा ही जाने

कितनी आँखों में बुझ बुझ जला है जो
वो आरती का दिया दुनिया माने

मनों अँधेरा खदेड़ते नन्हें से चिराग
दिवाली की रात पूनम सी इतराती जानें

बुधवार, 27 अक्टूबर 2010

हम तेरे शहर से गुजरे

हम तेरे शहर से गुजरे , काफिला था साथ अपने
होते हैं दगाबाज तो , कच्ची उम्र के रंगी सपने 

खेल कर तुम तो गये , मन्जर हो गये हैं खड़े
चल रहे हैं गाफिल सी बहर में , यादों में सँग-सँग अपने

कुसूर कोई तो होता , टीस सी लिये दिल में
चिन्गारी दामन में लिये , यादों की हवाएँ थीं साथ अपने

बुझा दिए खुद ही , अपने हाथों अरमानों के दिये
कच्ची सीढ़ियाँ चढ़े थे , अपनी आँखों के रंगी सपने 

वफ़ा की राह में , बेकसी फूलों की देखो तो
खिले हुए हैं आरजू-ए-चमन में , खुशबू नहीं साथ अपने

गुरुवार, 21 अक्टूबर 2010

नहीं इसका नाम !


हर आहट को समझा उसका पैगाम
हर मन्जर को किया मैंने सलाम

कितने ही पिये उम्मीद के जाम
कैसी है आहट , कैसे अन्जाम

अँगना में ठहरी है वो ही शाम
कोई सुबह क्या नहीं मेरे नाम

चलता है वही जो हमको थाम
वही अपनी डोरी वही गुलफाम

रँग देखे दुनिया के अजब अनाम
ख़्वाबों-ख्यालों की दुनिया तो ...नहीं इसका नाम , नहीं इसका नाम !

सोमवार, 11 अक्टूबर 2010

कितने साबुत और बचा क्या

चन्दा तेरा रूप पिऊँ क्या
दूर तू है तेरा साथ जिऊँ क्या

तू तन्हा दिन रात चला है
तेरी पीड़ है मुझसे जुदा क्या

मेरी आँख का आँसू चुप है
और भला खामोश सदा क्या

साथ साथ चलते हैं हम तुम
कितने साबुत और बचा क्या

तेरी मुसाफिरी बनी रहे
मेरा क्या है माँगूं क्या

मेरे गीतों में तू ही तू
ऐसा अपना नेह है क्या

दूर से दिखते मिलते हुए
धरती-अम्बर कभी मिले हैं क्या

पी लूँ चाँदनी चुल्लू भर
सफ़र में थोड़ा आराम क्या

सहराँ भी ले लेता दम-ख़म
तू भी बता, तेरी मर्जी क्या

मेरी आवाज में सुन सकते हैं _
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