बुधवार, 11 नवंबर 2009

हर हिस्से की धूप तय है

मौसम भी क्या शय है
हर हिस्से की धूप तय है

करता है गुलशन जो बेमानी
पकड़ी जाती है नादानी

जीवन की ये कैसी लय है
छाया की प्यासी मय है

अजीब हादसा है बेनामी
मुँह छिपाए है गुमनामी

सरक जाने का भय है
धूप-छाया की कच्ची वय है

शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

पीड़ा कब पढ़ आई हिज्जे

अपनी पीड़ा को बाँधोगे ,सँगीत ,बहर और काफिये में
सैलाब कहाँ बहता है , किनारे समेट के सिम्तों में

बाँधो बाँधो टुकड़ों में , हवा और आँधियों को
कर लो तुम क़ैद गुबार, धुँए और लपटों को


सरहद बाँधे इन्सानों को , मजहब बाँधे भगवानों को
इश्क की कोई जात नहीं होती , कब बंधता है ये जुबानों में


कभी सजता है बहरूपिये सा , गीतों गजलों की महफ़िल में
भारी पड़ती कायनात पे वो , जो हूक सी उठती है दिल से


पीड़ा कब पढ़ आई हिज्जे , गीत , बहर और काफिये के
सदियों ने पाला है इसको , चढ़ बैठी जो ये हाशिये पे

रविवार, 25 अक्टूबर 2009

जो लम्हात हमसे लिखवाते हैं

जज्बात हमसे लिखवाते हैं
है कोई न कोई तो बात
जो लम्हात हमसे लिखवाते हैं


अपने हाथों में जिन्दगी जितनी बच जाये
फिसले जाते हैं दिन रात
जो लम्हात हमसे लिखवाते हैं


अपना चेहरा ही नहीं जाता है पहचाना
हुई ख़ुद से यूँ मुलाकात
जो लम्हात हमसे लिखवाते हैं


रोये गाये भारी मन को हल्का करने
उतरे लफ्जों में हैं हालात
जो लम्हात हमसे लिखवाते हैं


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सोमवार, 5 अक्टूबर 2009

तिनका है बना पतवार कहीं


ले चल मुझको तू पार जरा
तिनका है बना पतवार कहीं

चलना है धारा के सँग-सँग
हूँ बीच नहीं मझधार कहीं


डगमगाया है तूफाँ ने जितना
उतना ही तू दमदार कहीं

चाहत ले आती है रँग इतने
इस रौनक का तू हक़दार कहीं

चिड़ियाँ चहचहाती हैं तो जरुर
सुबह किनारे की है तरफदार कहीं

जगते बुझते तेरे हौसलों में
चाहत का ही कारोबार कहीं

छोटा अणु ही तो इकाई है
परमाणु का सूत्रधार कहीं

मंगलवार, 29 सितंबर 2009

दिन है बड़ा मटमैला सा

अब न शाम-सहर
दिन है बड़ा मटमैला सा
उड़ गया चैन मेरे हाथों से
नीँद की ही तरह
अब न शाम- सहर

रातें जो न हों तारों भरी
हम जुगनू लेकर चल लेते
छल करता है सूरज जब-जब
छाया का टुकड़ा दे दे कर
दिन का है कहो , ये कौन पहर
अब न शाम- सहर

दिन कब होते सब एक से हैं
छाया भी यहाँ बेमानी सी लगे
अपना ही आप कहानी सी लगे
किस से मिल कर , ढाया ये कहर
अब न शाम- सहर

रोया था उस दिन आसमाँ भी
आया था जब वो साथ मेरे
पसीजा था तो मेरी ही तरह
बिखरा हुआ , आया था नजर
अब न शाम-सहर


रविवार, 30 अगस्त 2009

सुरुरों ने आ लिखा है

मैंने लिखा नहीं है
सुरुरों ने आ लिखा है

ये बात कह रही है
बरसों से दुनिया सारी
जुनूनों ने आ लिखा है

धड़कन ये कह रही है
उसकी जुबाँ नहीं है
बेजुबानों ने आ लिखा है

जन्मों से चल रहा है
जिसे देख के हैं चलते
उन्हीं रँगों ने आ लिखा है

अपनी खता नहीं है
तुम्हें पा के हम जो खिलते
कुसूरों ने आ लिखा है

मैंने लिखा नहीं है
सुरुरों ने आ लिखा है


शुक्रवार, 21 अगस्त 2009

ठण्डी हवा के झोंके

ठण्डी हवा के झोंके , छूकर हैं जब गुजरते
छूकर हैं उनको आये , वादों से जो मुकरते

खुशियों के ये इरादे , कैसे सनम पकड़ते
बहती हवा के मानिंद , दामन में न ठहरते

सिर चढ़ के जो बोले , देखो सुरूर चढ़ते
मीठी सी नीँद बन कर , दिल में हैं यूँ उतरते

ठहरा है काफिला भी , देखो इसे गुजरते
खुशबू है पीछा करती , दामन से जो उलझते

ठण्डी हवा के झोंके , छूकर हैं जब गुजरते
गहरी सी टीस बन कर , मौसम को यूँ निगलते