शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

कदम जमा जमा कर

रेत पर चल रहे हैं कदम जमा जमा कर
न जाने कौन सी लहर हो तूफाँ से हाथ मिलाये हुए

किसी को पँख मिले हैं परवाज़ के लिये
किन्हीं क़दमों को सरकने की गर्मी भी न नसीब हुए

कोई चढ़ रहा है कामयाबी की सीढ़ियाँ
कोई दामन में है बिखरे अहसास सम्भाले हुए

कहीं जमीन कम , है कहीं आसमान कम
इसी हेरफेर में जाने कितने हैं धराशाई हुए

हवाएँ हैं , चिराग है , है नमी कम
सूखे में हौसले भी हैं भरमाये हुए

जाने वो कौन सी सहर है या लहर
बीच भँवर में कश्ती को आजमाये हुए








बुधवार, 4 अगस्त 2010

ख्याल जिन्दा है

बुत बने बैठे हैं मगर जिन्दा हैं
झाँक के देखा है अन्दर कोई शर्मिन्दा है

भलमन-साहत को नासमझी समझ लेते हैं लोग
भटकना मुश्किल है जमीर जिन्दा है

उठ गया कारवाँ साथ हसरतों के ही
सो गया सब कुछ गुबार जिन्दा है

घड़ी की तरह चलती हैं धडकनें
रुकी नहीं हैं सामान जिन्दा है

मन्दिर-मस्जिद भी गए , वो बोलता ही नहीं
ज़माने में मगर उसका करम जिन्दा है

कहाँ से लाऊँ बुतों की बस्ती में खुदा
तलाश जारी है , ख्याल जिन्दा है

गुरुवार, 29 जुलाई 2010

घर से मन्दिर की दूरी

घर से मस्जिद है बहुत दूर , चलो कुछ यूँ कर लें
चन्द रोते हुए बच्चों को हँसाया जाये
कुछ इसी तर्ज़ पर ( यूँ तो बहुत चुप रहती हूँ मैं , मगर मेरी लेखनी को सच बोलने की बीमारी है ) । .......

घर से मन्दिर की दूरी तय कर लें
चलो आज किसी का भी दिल न दुखायें

कर्म बन जाते हैं पूजा ही
जो किसी किस्मत को सँवार आयें

न फुर्सत है न चाहत ही है
कभी खुद से भी मिल आयें

भीड़ में भी तन्हा ही हैं
चन्द लम्हें किसी को सुन आयें

कितना बोलती है ये , चलो
यादों की गठरी को कहीं छोड़ आयें

रविवार, 18 जुलाई 2010

साँस-साँस दुआ ही हो

कितनी ही टिप्पणियाँ और कितनी ही रचनाएं पढ़ी जाने के बाद नई रचनाओं का जन्म होता है । निचली पोस्ट ' सखी सी ही ' पर पहली टिप्पणी क्षमा जी की , उन्होंने लिखा कि किसी की लिखी हुई ये पंक्तियाँ याद आ गईं ।
हर रूह में इक गम छुपा लगे है मुझे
ज़िन्दगी तू इक बद-दुआ-सी लगे है मुझे

बस यहीं से जन्म हुआ इन पंक्तियों का

गम लाख हों सीने में मगर जिन्दगी बददुआ न हो
कडवे घूँट पीकर भी , साँस-साँस दुआ ही हो

बड़े जतनों से माली ने पाला हो जिसे
वो नाजुक सी बेलें फूलों की हमनवाँ ही हों

नीम के पेड़ पर चढ़ कर भूले अपना भी पता
रास आया तो नहीं खिली हुई मगर वफ़ा ही हो

हवाओं में बिखर या खुशबू से लिपट
दूर फ़िज़ाओं में बुलाता हुआ वो अपना पिया ही हो

सैलाब को मोड़ें तो सीँचे हर कोई
खेत-खलिहानों में उगती हुई फसल नगमा ही हो

सोमवार, 5 जुलाई 2010

सखी सी ही

वक़्त का चेहरा भी है पहचाना हुआ
जिन्दगी तू भी है सखी सी ही


छलकती हो चाहे जिन्दगी कितनी
नजर में है चाहत की कमी सी ही

गले लगाऊँ किसे और रूठूँ किस से
हर आँख दूसरी में है नमी सी ही

कल के हिस्से का हमें आज नहीं मिलना है
वक़्त के हाथ में है खुदाई सी ही

मंगलवार, 22 जून 2010

जीते जी सर से

छन गया जीवन भी वक़्त की ही तरह
अपने हाथों से सँभाला न गया

मिट गए दुनिया की खातिर
मगर तन्हाई का निवाला न गया

स्याह रातों में दिल जला कर ही सही
राह से उम्मीद का उजाला न गया

अपनी दुनिया भी अजब सलमे-सितारों है जड़ी
जीते जी सर से दुशाला न गया

दुहाई दे दे कर कहते रहे
खुद के होने का हवाला न गया

शनिवार, 12 जून 2010

वक़्त से हाथ मिला लिया

हिन्दयुग्म से बैरंग लौटी मेरी रचना ,...

जीने की आरजू ने हर गम भुला दिया
रोये बहुत थे हम मगर , चाहत को सुला दिया

भारी पड़ता है इश्क तो गमे-रोज़गार पर
न हवा निवाला बनती , क्या पी के जी रहते
उतरे जो हम जमीं पर , टुकड़ों ने सिला दिया
जीने की आरजू ने हर गम भुला दिया

दबी सी हैं चिंगारियाँ कुछ राख के तले
न हवा कभी चलती , न कभी वो लपटें उठतीं
होती जो कभी आहट , उसने ही क्या कुछ हिला दिया
जीने की आरजू ने हर गम भुला दिया

अश्कों में ढला गम तो गीतों में सज गया
जब कुछ न रहा बाकी , तो कुछ बन के आ गया
लो इसने आज भी , जीने की वजह से मिला दिया
जीने की आरजू ने हर गम भुला दिया

ढूँढा बहुत तुझे ऐ दोस्त अपनों के लग गले
तुझे कुछ सुनाई नहीं देता , तन्हाई में भी कितना शोर पले
मर्जी उसकी है , वक़्त से हाथ मिला लिया
जीने की आरजू ने हर गम भुला दिया

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