काश कोई तो हमनवाँ होता
दिल इतना न धुआँ-धुआँ होता
कोई पहल तो की होती
फ़ासला इतना न दरमियाँ होता
ज़हन से निकला ही नहीं
साथ यादों का कारवाँ होता
कोई तो जमीं बच रहती
वक़्त इतना तो मेहरबाँ होता
अपने ही दुखाते दिल को
दिल इतना भी ना पशेमा होता
वक़्त सज तो सकता था
बाहों में कोई तो आसमाँ होता




6 टिप्पणियां:
बेहतरीन ग़ज़ल
आभार
वंदन
आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में गुरुवार 13 अगस्त, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
वाह
बेहतरीन शायरी
शानदार गज़ल...कोई तो जमीं बच रहती
वक़्त इतना तो मेहरबाँ होता ...वह
वाह !!!
बहुत ही सुन्दर ।
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