मंगलवार, 11 अगस्त 2026

काश

 

काश कोई तो हमनवाँ होता 

दिल इतना न धुआँ-धुआँ होता 


कोई पहल तो की होती 

फ़ासला इतना न दरमियाँ होता 


ज़हन से निकला ही नहीं 

साथ यादों का कारवाँ होता 


कोई तो जमीं बच रहती 

वक़्त इतना तो मेहरबाँ होता 


अपने ही दुखाते दिल को 

दिल इतना भी ना पशेमा होता 


वक़्त सज तो सकता था 

बाहों में कोई तो आसमाँ होता 

6 टिप्‍पणियां:

Digvijay Agrawal ने कहा…

बेहतरीन ग़ज़ल
आभार
वंदन

Digvijay Agrawal ने कहा…

 आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में  गुरुवार 13 अगस्त, 2026 को लिंक की जाएगी ....  http://halchalwith5links.blogspot.in  पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

वाह

Anita ने कहा…

बेहतरीन शायरी

Alaknanda Singh ने कहा…

शानदार गज़ल...कोई तो जमीं बच रहती

वक़्त इतना तो मेहरबाँ होता ...वह

Sudha Devrani ने कहा…

वाह !!!
बहुत ही सुन्दर ।