गुरुवार, 16 अप्रैल 2009

सूरज को अभी देर है

हवा का इक झोँका था , मैनें द्वार तक सजा लिया
सूरज को अभी देर है , तेरे घर तक आने में
इक सपना दिखाने को आँख लगी हो जैसे

ठगे से देखते हैं गुलशन की नाउम्मीदी को
तूने अपनी ही कोई बात कही हो जैसे

रूठा है मेरा अपना ही , मुझसे मेरा सँसार कहीं
तेरी हर पीड़ पराई हो जैसे

झुक जाता है अम्बर भी तो , धरती का तकना बेकार नहीं
छूटे लम्हें पकड़ने को साँस रुकी हो जैसे
सूरज को अभी देर है , तेरे घर तक आने में

मेरी ही आवाज में
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गुरुवार, 9 अप्रैल 2009

मौसम का तकाजा करना

दो चार गलियाँ घूम लो
फ़िर करके ,
मौसम का तकाजा करना

क्यूँ जुदा थीं अपनी राहें
ये बात ज्यादा करना

वक्त कब रुकता कहीं
गम ज्यादा करना

सीने में दरक गया है कुछ
तुम अन्दाजा करना

ख़ुद से ही बातें करते हैं
मौसम का तकाजा करना

पलकों पे बिठाना तो आता है हमें
तुम नूर की दुनिया से इशारा करना

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2009

पकड़ा है कस के कल को

आसमान उसका छूटा हुआ है
दिल जिसका टूटा हुआ है

कहर बन कर बरपी है बिजली
अरमानों के दिये बुझ गये हैं

वो उड़ने चला था आसमां में
पँख उसके जख्मी पड़े हैं

ये हवाएँ जो दिखती हैं चुप सी
उसके सीने को नश्तर लगे हैं

उसने पकड़ा है कस के कल को
आज उसके हाथों से छूटा हुआ है

आसमां तो है बाहें फैलाये
परिन्दा अपनी उड़ानों से रूठा हुआ है

सोमवार, 23 मार्च 2009

उपहार की बातें करें

कामना और प्यार के इजहार की बातें करें
लो चले आये हैं वो , उपहार की बातें करें

माँगते रहे जो हम , प्यार को दिलदार को
किस्मत के उसी दुलार की बातें करें
रात-दिन ख़्वाबों में उठते ज्वार की बातें करें

गुनगुनाता है जो मीत , मीत के उस गीत के
स्वरों की झन्कार की बातें करें
शहनाई के उस लाड़ के मधुर सँसार की बातें करें

बुधवार, 11 मार्च 2009

एक किरण आशा की


एक किरण आशा की , सपने हजार लाती है
डूबे हों कितने भी , पल में उबार लाती है

तिनका-तिनका बिखरे हों , जमीं से उखड़े हों
राहगुजर दिखलाती , एक किरण आशा की
मन्डराते बादलों से पँख उधार लाती है
डूबे हों कितने भी , पल में उबार लाती है

बादलों से गुजरे हों , रंग सब बिखरे हों
खुशबू की तूलिका सी , एक किरण आशा की
सुरमई सपनों के मन्जर उतार लाती है
डूबे हों कितने भी , पल में उबार लाती है

तिनकों सा जुड़ती है , हवाओं में घुलती है
सुबह सी सतरंगी ,एक किरण आशा की
दस्तक देते ही सूरज उतार लाती है
डूबे हों कितने भी , पल में उबार लाती है

एक किरण आशा की , सपने हजार लाती है
डूबे हों कितने भी , पल में उबार लाती है

रविवार, 8 मार्च 2009

इक बोल मेरी ओर

वो जो इक बोल मेरी ओर
तुमने उछाला मानों
लपक के पकड़ा मेरे दिल ने
कोई निवाला जानो

बरसा गया कोई बादल
ठण्डी फुहारें मानो
खिल गये फूल और कलियाँ
आईं बहारें जानो

बिना बोले ही तेरी नजरों ने
उछाले दिलासे मानो
झोली भर ली , छंट गये
सारे कुहासे जानो

शनिवार, 7 मार्च 2009

तूफाँ में नहीं हिलना

तूफाँ में नहीं हिलना
तूफाँ के साथ बहना
मुश्किल है मुश्किल में
लहरों को यूँ गिनना

डूबेगा ख़ुद ही तो
अर्जी है भँवर की ये
समँदर की मौजे हैं
किनारे छू के मुस्करायें

मचलें हैं लहरें तो
चंदा से मिलने को
बेशक उनकी भी तो
हर आस अधूरी है

कुछ भी छूटे या रूठे
मौजों के साथ बहना
तरंगें ही जीवन है
हर पल है यही कहना