मंगलवार, 25 मई 2021

बचपन की महक

 

सुनो वीना.... ऐ दोस्त ,तकरीबन साढ़े चार दशकों के बाद तुमसे मिलने का इन्तज़ार , आँखों में बसी उस उम्र की कमनीयता , दिल में बसा वही सौन्दर्य..... उस उम्र में जब मैं दूसरे शहर से स्कूल में नई-नई आई थी , तुम्हारा अपना ग्रुप था ..... तुम , सीता ,अमृत ,आशा गाबा ,निर्दोष , मधु ,कमल ,पुष्पा ,अनीता, सब। कितने अपनत्व से तुम सबने मुझे गले लगा लिया था। वैसा फिर कम ही हुआ। लोग दूसरे के बारे में एक राय कायम किये रहते हैं और एक नट-शैल के अन्दर रहते हैं। 

ये तो जानती थी चेहरे अब वैसे नहीं होंगे। उम्र जब दस्तक देती है तो शिकनों की तरह अपनी छाप छोड़ती जाती है। ज़िन्दगी की उदासियाँ ,कड़वाहटें भुलाने के लिये एक अदद दोस्त ही काफी होता है। जब तुम मुझे मिलने आ रहीं थीं देखो मन ने क्या लिखा ..... 

मुद्दत हुई उस ज़माने से मिले 
आओ ऐ दोस्त के कुछ सुकून जैसा मिले 

तैरने लगी बचपन की आबो-हवा 
ऐसा लगा गुजरे ज़माने से मिले 

बड़ी धूप है ऐ दोस्त 
सहरा में हर कोई प्यासा ही मिले 

आँखें तो ढूँढती हैं ऐ मेरे दोस्त 
बहाने की तरह कोई दिलासा सा मिले 

दोस्त होते तो टिके रहते 
वरना दुनिया में लोग बहुतेरे मिले 

तलाशेंगी मेरी आँखें तुम्हारी आँखों में 
वही अल्हड़पन जो कहीं दुबारा मिले 

कुछ बची होगी हमारे-तुम्हारे बचपन की महक 
आ उसी राब्ते को फुर्सत से मिलें 

रविवार, 2 मई 2021

कोरोना


उम्र ये किस मुक़ाम पर है

दुनिया ढलान पर है 


हर तरफ़ है बदहवासी 

सीने में कुछ उफान पर है 


बह  जाये कहीं मनोबल 

तेरी बस्ती तूफ़ान पर है 


प्रार्थना में है बड़ा बल 

दिल में वही रख जो ज़ुबान पर है 


आज वो है कल मैं निशाना 

कोई शिकारी मचान पर है 


आहों पर खड़ा  कर महल 

ये तिलस्म शमशान पर है 


जो गये उनका शोक मनायें के ज़िन्दों की खैर करें

मेरे मौला , ये कौन सी मुसीबत जहान पर है


दुआ और दवा का मेल हो 

मन का पंछी उड़ान पर है 

शुक्रवार, 8 जनवरी 2021

अहसास की स्याही


रिश्तों की अमीरी अक्सर 
आड़े वक्त में अँजुरि से झर जाया करती है
 
न ज़ुदा करना ज़मीन से किसी को 
वरना पनपते नहीं ,जड़ें भी मर जाया करती हैं
 
सलोनी सूरत भी जो गिर जाये नजरों से 
तो दिल से उतर जाया करती है 

लहज़ा बता देता है रिश्ते की गहराई 
यूँ ही नहीं संवेदनाएँ मर जाया करती हैं 

सबको तौल रहे हो एक ही तराजू पर 
ये खुमारी भी वक्त के साथ उतर जाया करती है
 
ऐ मौत के मुसाफिर ,उल्टी गिनती है साँसों की 
ज़िन्दगी पकड़ने की खातिर ही ,उम्र गुजर जाया करती है 

कोई पहलू नहीं रहता अछूता कलम के हाथों से 
अहसास की स्याही पन्नों पर बिखर जाया करती है
 
सूरज तो हरदम है सफर पर अपने 
भर लो मुठ्ठी ,किरणें घर-घर जाया करती हैं 

शुक्रवार, 1 जनवरी 2021

नया साल है ,नई बात हो





नया साल है ,नई बात हो 
नई सुबह है ,करामात हो 
कोविड से पीछा छूटे 
नई फ़िज़ाँ हो ,समाँ साथ हो 

अपने दम पर जीना सीखा 
अपनों का सँग-साथ भी छूटा 
नेट की दुनिया से वाकिफ हर कोई 
बस इक स्मार्ट फोन हाथ हो 

घर लौटो अब किसान भाई 
धरती माँ है बाट जोहती 
मिल के मनायें लोहड़ी पर्व को 
ढोल-नगाड़े ,घर-परिवार साथ हो 

लौट आये अब दिल की दिवाली 
जग जाये जगन तपन अब 
मन मयूर सा नाचे अब तो 
नस-नस में सँगीत की थाप हो