सोमवार, 21 नवंबर 2022

चलना होगा

 बहुत कुछ नहीं होगा तेरे मन का , फिर भी तुझे चलना होगा 

ये लम्हों का सफ़र सदियों-सदियों का चलना होगा 


तुम भूल गए हो के वो दोस्त नहीं है 

लब पर आते हुए लफ़्ज़ों को संभलना होगा 


तुमको वफ़ा करनी थी इसीलिए की

बेचैनियों के बिस्तर पर रात को ढलना होगा 


ज़िन्दगी महज़ ख़्यालों के सिवा कुछ भी नहीं 

रोज़ मरते-जीते खुद को ही छलना होगा 


छाँव क़िस्मत में होगी तो मिलेगी 

हवा का रुख़ मोड़ना परछाइयों से मिलना होगा 


मंज़िल थी सामने ही फिर भी पहुँचे न हम कहीं 

किसे पता था दिल से दिल तक का सफ़र , मीलों-मील का चलना होगा 

शुक्रवार, 5 अगस्त 2022

ज़िन्दगी निभाने में

 बूँद-बूँद रिस गये हम , उम्र के प्याले से 

रीते रहे हम , ज़िन्दगी के निवाले से 


तुरपनें , पैबंद, बखिए , सीवनें 

सारी क़वायदें ज़िन्दगी निभाने में 


आँखों के सामने पतझड़ जो उतरें 

सीने के मौसम कैसे फिर निखरें 


हमने तो अक्सर तिनके की छाँव में 

खुद को सम्भाला , धूप के गाँव में 


अपनी-अपनी धरती है , अपना-अपना अम्बर है 

एक ख़ुदा बाहर तो एक पैग़म्बर अन्दर है