गुरुवार, 3 सितंबर 2026

दोस्त बन के आइए


कभी दोस्त बन के आइए 

जिगर में ही समाइये 

कसक सी उठती है दिल में 

यूँ न हमें आज़माइए 


मीलों तक जो फैला 

सहरा भला रास आता किसे 

दिल में भर के बस थोड़ी सी वफ़ा 

आँखों से जगमगाइए ,टिमटिमाइये 


फ़िज़ाँ में रंग भरिए 

गुलों को ही महकाइए 

खिल जाएँगे सारे सब्ज़-बाग 

ख़ुशबू-ए-अहसास संग लाइये 


साजेदिल अजीब है   

बस जरा सा गुनगुनाइए  

बज उठती हैं धड़कनें 

दिल को ही बजाइए , दोस्त बन के आइए 

मंगलवार, 11 अगस्त 2026

काश

 

काश कोई तो हमनवाँ होता 

दिल इतना न धुआँ-धुआँ होता 


कोई पहल तो की होती 

फ़ासला इतना न दरमियाँ होता 


ज़हन से निकला ही नहीं 

साथ यादों का कारवाँ होता 


कोई तो जमीं बच रहती 

वक़्त इतना तो मेहरबाँ होता 


अपने ही दुखाते दिल को 

दिल इतना भी ना पशेमा होता 


वक़्त सज तो सकता था 

बाहों में कोई तो आसमाँ होता 

शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

आनी-जानी शय


धूप आनी-जानी शय है 

आज़मा कर देखिए 


अपने दम पर छाया को ख़ुद 

घर बुला कर देखिए 


आएगी ख़ुशबू ही ख़ुशबू 

बस जरा हस्ती मिटा कर देखिए 


रोक लेते काँटे रास्ता 

फूलों को अपना बना कर देखिए 


मजबूरी में हमने तुमने लाख पी डाले गरल 

एक ग़म ही ख़ुश हो कर सीने से लगा कर देखिए 


हिल जाएगी सारी इमारत 

नींव का बस एक ही पत्थर हिला कर देखिए 



शनिवार, 11 जुलाई 2026

नग़मे


नग़मे जो गाये नहीं गए 

वक़्त की धुन पे बजाए नहीं गए 

फूल झरते रहे डालियों से 

ज़ुल्फ़ों में सजाए नहीं गए 


वक़्त की नज़र पड़ी ही नहीं 

सफ़हे से उतरे तो उतर गए दिल से 

उजड़े घर फिर बसाए नहीं गए 


लाख कोशिशें हों मुक़द्दर से किसी की 

पसीजा जो न वही लम्हा तो 

किसी छाँव से बहलाए नहीं गए 


अपनी भी ज़िद ही रही 

हमें सूरज की थी दरकार 

जुगनुओं से हम बहलाए नहीं गए 


वक़्त आता है तो तन्हाइयाँ भी सजती हैं 

जी उठते हैं हज़ार अक्सों में 

वक़्त की छाँव से जो दोहराए नहीं गए 

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026

धरती फूलों वाली

 

हम चल तो लेते इठला के मगर 

कोई धरती फूलों वाली न हुई 


फ़िज़ाएँ इत्र सी महकती तो रहीं 

बस हवा ही मेहर वाली न हुई 


खुल जाते हम दो-चार मुलाक़ातों में 

कोई आँख चाहने वाली न हुई 


चलना था साहिल तक हमको 

और राह कोई भी सवाली न हुई 


टेढ़े रहना था आँगन को 

और चाल भी बस मतवाली न हुई 


काँटों से हमने कर ली यारी 

अब झोली भी अपनी ख़ाली न हुई