शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026

धरती फूलों वाली

 

हम चल तो लेते इठला के मगर 

कोई धरती फूलों वाली न हुई 


फ़िज़ाएँ इत्र सी महकती तो रहीं 

बस हवा ही मेहर वाली न हुई 


खुल जाते हम दो-चार मुलाक़ातों में 

कोई आँख चाहने वाली न हुई 


चलना था साहिल तक हमको 

और राह कोई भी सवाली न हुई 


टेढ़े रहना था आँगन को 

और चाल भी बस मतवाली न हुई 


काँटों से हमने कर ली यारी 

अब झोली भी अपनी ख़ाली न हुई 


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