हम चल तो लेते इठला के मगर
कोई धरती फूलों वाली न हुई
फ़िज़ाएँ इत्र सी महकती तो रहीं
बस हवा ही मेहर वाली न हुई
खुल जाते हम दो-चार मुलाक़ातों में
कोई आँख चाहने वाली न हुई
चलना था साहिल तक हमको
और राह कोई भी सवाली न हुई
टेढ़े रहना था आँगन को
और चाल भी बस मतवाली न हुई
काँटों से हमने कर ली यारी
अब झोली भी अपनी ख़ाली न हुई

