सोमवार, 18 जुलाई 2011
पंख दिए हैं मगर किस से कहें
मुझे भी दिया है मगर कुछ कमी सी है
पंख दिए हैं मगर किस से कहें
क्यों परवाज़ में कोताही सी है
लम्हें सिर्फ टंगे नहीं हैं दीवारों पर
माहौल में कुछ गमी सी है
आदमी आदमी को पहचानता कब है
अलग अलग कोई जमीं सी है
हाल मौसम का ही अलापते रहे उम्र भर
इसी राग में ढली कोई ढपली सी है
खिजाओं में है कौन फलता फूलता
गमे यार है सीने में नमी सी है
आ गए अलफ़ाज़ जुबाँ पर छुपते छुपाते
कलम की हालत भी हमीं सी है
न करें सब्र तो क्या करें
जिन्दगी की ये शर्त भी कड़ी सी है
शुक्रवार, 1 जुलाई 2011
तेरे आने से
जिन्दगी साजे-ग़ज़ल हो जाये
जिन्दगी कड़वी नहीं मीठी सी
किन्हीं दुआओं का फल हो जाये
यूँ ही कहते नहीं आफताब तुम्हें
तेरी आँखों की चमक मेरा नूरे-महल हो जाये
जिन्दगी यूँ भी बहुत मुश्किल थी
तेरे आने से बहारों को खबर हो जाये
कैसे कह दूँ के है इन्तिज़ार नहीं
तेरी साँसों की महक जिन्दगी का सबब हो जाये
किसने देखा शम्मा को बूँद बूँद मिटते हुए
जल के परवाना अमर हो जाये
सोमवार, 20 जून 2011
जलना शम्मा को अपने ही दम पड़े
यूँ न रूठो खुद से इतना ,
के मनाने ज़िन्दगी भी आये तो कम पड़े
आयेंगे हर मोड़ पे इम्तिहाँ लेने को गम बड़े
ज़िन्दगी के ख़जाने में साँसें गिनती की
कितनी पास हैं कज़ा के ,कितनी दूर हम खड़े
ज़िन्दगी अमानत है खुदा की
गौर से देखो कितने अक्सों में हम जड़े
ये नहीं है के छाया कभी देखी न हो
मन ही पागल है के इसके हिस्से ही गम पड़े
चलती रहती है यूँ ही सारी दुनिया
सो गए हम तो क्या सूरज भी थम पड़े
एक धागे का साथ जरुरी है
जलना शम्मा को अपने ही दम पड़े
उठो , अहतराम कर लो ज़िन्दगी का
जश्न से गुजरे तो भूल जायेंगे ख़म बड़े
मंगलवार, 14 जून 2011
सब फ़ानी ही लगे
बारूद के ढेर पर कोई कहानी ही लगे
फूलों को बोना भी जरुर
काँटों में इनकी महक ज़िन्दगानी ही लगे
तोड़ कर तारे तो मैं ले आऊँ
जो मेरे हाथ कोई मेहरबानी ही लगे
न आए कोई तो क्या कीजे
दिल जलाना भी नादानी ही लगे
वक्त के हाथ हैं तुरुप के मोहरे
पत्तों की बाज़ी भी आसमानी ही लगे
भस्म कर देती है चिन्गारी भी
राख के ढेर तले आग पुरानी ही लगे
छाछ भी फूँक के ही पीता है
जले दूध के को सब फ़ानी ही लगे
शुक्रवार, 20 मई 2011
धूप छाया भी सुलगते ही मिले
इमारत के बुर्ज हिलते मिले
न गुजरें दिन न गुजरें रातें
हाथों से उम्र फिसलती मिले
या खुदा , आदमी का ऐसा भी मुकद्दर न लिख
गुजर जाए वक्त और आदमी खड़ा ही मिले
जीने के बहाने थोड़े मिले
मरने के बहाने बहुतेरे मिले
प्यास उम्रों से लगी है
धूप छाया भी सुलगते ही मिले
कुँए-तालाब , पेड़-पौधे
मौसम की राह तकते ही मिले
भला बताओ वो दोस्त कैसे हुए
फासले रख के जो दोस्तों से मिले
छिपी हैं वेदनाएँ ही संवेदनाओं में
इसीलिए हर कोई अक्सर हिलता ही मिले
शुक्रवार, 6 मई 2011
रुके रुके से दिन
रुके रुके से दिन परछाइयाँ चलती हुईं
धू-धू कर जल उठीं अमराइयाँ कितनी
स्कैच बना कर खुदा रँग भरना भूल गया
काले सफ़ेद वर्कों में रुसवाइयाँ कितनी
बहला रहे हैं खुद को आँकड़ों के खेल में
जिन्दगी की दौड़ में गहराइयाँ कितनी
सँकरे रास्ते भी देते हैं पता मंजिल का
चल चल कर बनती हैं पगडंडियाँ कितनी
अपनों के बिखर जाने से डर लगता है
भले ही दूर हों मगर हैं नजदीकियाँ कितनी
तगाफुल होते ही रहते हैं राहे इश्क में
बचे साबुत तो देखेंगे के हैं बरबादियाँ कितनी
साजिश में दुनिया की खुदा भी था शामिल
शिकायत कैसे करें , हैं उसकी मेहरबानियाँ कितनी
मंगलवार, 26 अप्रैल 2011
कैसे जिया जाता है
आ तुझे बता दूँ मैं , कि कैसे जिया जाता है
कैसे पलकों पे , सपनों को सिया जाता है
रुसवाई कैसी भी हो , जीवन से नहीं बढ़ कर है
लम्हे लम्हे को पी कर के , उत्सव को जिया जाता है
रूठे खुद से हो , सपनों की दुहाई देते हो
चाहत के रेशमी धागों से , जख्मों को सिया जाता है
जोश और जुनूनों को , किनारों का पहनावा दे कर
रँग और नूर की बरसातों से , खुशबू को पिया जाता है
आ तुझे बता दूँ मैं , कि कैसे जिया जाता है
कैसे पलकों पे , सपनों को सिया जाता है