शनिवार, 1 दिसंबर 2012

एक पता अपना भी होता

किसी ज़मीन पर , किसी गली में मेरा घर नहीं 
साथ चल रहा है वो मेरे , पर नहीं 

इकतरफा है मेरे गालों की लाली 
खवाबों-ख़्यालों का कोई ज़र नहीं 

हर दिन वो गुजारेगा इसी राह से 
और टूटने का अब डर नहीं 

रोंयेंगे कितना हाले-सूरत को 
उधड़ेंगे , जायेंगे मर नहीं 

किस से कहें कैसी मजबूरी 
दुनिया में आये अकारथ ,पर नहीं 

एक ज़रा सा दिल दे देते 
एक पता अपना भी होता 
यूँ ही नहीं जाते दुनिया से 
मायूस हैं हम , पर नहीं 

19 टिप्‍पणियां:

  1. उम्दा ख्याल बहुत ही सुन्दरता के साथ लिखी गई बेहतरीन रचना खासकर ये पंक्तियों में तो आपने जान डाल दी है।

    इकतरफा है मेरे गालों की लाली
    खवाबों-ख़्यालों का कोई ज़र नहीं

    हर दिन वो गुजारेगा इसी राह से
    और टूटने का अब डर नहीं

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  2. एक ज़रा सा दिल दे देते
    एक पता अपना भी होता
    यूँ ही नहीं जाते दुनिया से
    मायूस हैं हम , पर नहीं
    Jo bhee aap likh rahee hain...lagta hai,mere saaath ghat raha hai...khair behad takleef me...marz lailaj hai...dua karen ki,chalte phirte eeshwarko pyaree ho jaun.

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    1. नहीं शमा जी ...इन्सान अपनी विल पॉवर से बड़ी से बड़ी बीमारी भी जीत लेता है ...एक कविता में मैंने लिखा था कि आदमी वक्त से पहले मर जाता है ...जब वो गुलशन से मुंह मोड़ लेता है ...आपको तो साहित्य सेवा का उद्देश्य देकर भगवान ने इस दुनिया में भेजा है ...कलम से बढ़ कर दूसरी सखी नहीं हमारे लिए ..जीवन यात्रा ब्लॉग पर लिखी कुछ पोस्ट्स को पढ़ लीजिये ...शायद मन टिक जाए ...आप अपना ध्यान रखिये ..आपकी सेहत के लिए शुभ कामनाएं ..

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  3. बहुत बढ़िया ! अंतर्मन की वेदना को उजागर करते ख्यालात को उकेरा है आपने अपनी इस रचना में | ऐसे है ख्यालों को शब्दों का रूप देती रहें |

    टिप्स हिंदी में : गूगल ऐनालाइटिक को अपने ब्लॉग पर कैसे स्थापित करें

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  4. दो दिन बाद ही मैं भी नेट पर आई ...ये हमारी वाणी डॉट कॉम को क्या हुआ .ये भी नहीं खुल रही ...चर्चा में शामिल करने का बहुत बहुत धन्यवाद ...

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  5. बहुत ही बढियां गजल है..
    और बेहद भावपूर्ण भी...

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  6. एक पता अपना भी होता

    किसी ज़मीन पर , किसी गली में मेरा घर नहीं
    साथ चल रहा है वो मेरे , पर नहीं

    इकतरफा है मेरे गालों की लाली
    खवाबों-ख़्यालों का कोई ज़र नहीं

    हर दिन वो गुजारेगा इसी राह से
    और टूटने का अब डर नहीं

    रोंयेंगे कितना हाले-सूरत को
    उधड़ेंगे , जायेंगे मर नहीं

    किस से कहें कैसी मजबूरी
    दुनिया में आये अकारथ ,पर नहीं

    एक ज़रा सा दिल दे देते
    एक पता अपना भी होता
    यूँ ही नहीं जाते दुनिया से
    मायूस हैं हम , पर नहीं
    एक शैर इस गजल के नाम

    नाम था अपना पता भी ,दर्द भी इज़हार भी ,

    पर हम हमेशा दूसरों की मार्फ़त समझे गए हैं .

    वक्त की दीवार पर पैगम्बरों के लफ्ज़ भी तो ,

    बे -ख्याली में घसीटे दस्त खत समझे गए हैं .

    होश के लम्हे ,नशे की कैफियत समझे गए हैं ,

    फ़िक्र के पंछी ज़मीं के मातहत समझे गए हैं .

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  7. वेदना को व्यक्त करती प्रस्तुति

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  8. बहुत मुश्किल है दर्द छिपाना... उतना ही मुश्किल है... उसे बयाँ करना...
    आपके शब्दों में बहुत गहनता है...
    ~सादर!!!

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  9. सुन्दर कृति. हर पंक्तियाँ दिल को छू गयी.

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  10. बहुत ही खुबसूरत प्रस्तुति । मेरे नए पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा। धन्यवाद।

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मैं भी औरों की तरह , खुशफहमियों का हूँ स्वागत करती
मेरे क़दमों में भी , यही तो हैं हौसलों का दम भरतीं