रविवार, 30 नवंबर 2014

ऐसे हमको दो पर मौला

सपने ओढूँ ,सपने बिछाऊँ
मगर हकीकत से जी न चुराऊँ
कुछ ऐसी करनी कर मौला 
मेरी ज़िन्दगी में भी ,कोई रँग तो भर मौला 

कितना खोया , कितना पाया 
लाख सँभाला ,कहाँ टिक पाया 
चला-चली का मेला है बेशक 
मेरे हिस्से में भी , कोई रहमत तो कर मौला 

किसी ने दस्तर-खान बिछाया 
किसी ने पँखों को सहलाया 
लाख ज़ुदा हों अपनी राहें 
कोई फ़लक तो हमको मिला दे 
ऐसे हमको दो पर मौला 

शनिवार, 15 नवंबर 2014

वक़्त की नफ़ासत

है अदब भी फासले का दूसरा नाम 
होती है यूँ भी इबादत कभी-कभी 

जंजीरों की तरह रोक लेतीं हैं जो 
दीवारें भी बोलतीं हैं राहों की इबारत कभी-कभी 

चुप हो के भले बैठे दिखते हैं जो 
करते हैं वो भी बगावत कभी-कभी 

है आसाँ नहीं हवाओं का रुख मोड़ना 
करता है ज़मीर ही खिलाफत कभी-कभी 

लिखता है भला कौन ज़ुदाई के नगमे
चुभती है ये भी हरारत कभी-कभी 

चलता रहता है आदमी बिना सोचे-समझे 
अटका तो समझ आती है वक़्त की नफ़ासत कभी-कभी 

गुरुवार, 6 नवंबर 2014

दिल बाग़-बाग़ मुझे करना पड़ा

A few lines for my loving daughter ...

अपने क़दमों से तूने नापी दुनिया
दिल बड़ा मुझे करना पड़ा
तेरी उड़ानों में है आगे बढ़ने का मज़ा 
दिल कड़ा मुझे करना पड़ा
सूरज वही , चन्दा भी वही ,
तुझसे जुदा ,घूँट ये भी मुझे भरना पड़ा
सुनूंगी ,महसूस भी करुँगी तुझे
झप्पी जादू की से महरूम मुझे होना पड़ा
शाम होते ही आते लौट परिन्दे घर
नीड़ यादों से रौशन मुझे करना पड़ा
तेरी आहट से सज जाता था इन्तिज़ार भी
जागती आँखों में ख़्वाब मुझे बुनना पड़ा
यकीं तुझ पर भी है,तेरे सितारों पर भी
वक़्त की इस करवट से भी रूबरू मुझे होना पड़ा
दूर महकेगी तू किसी शाख पर
दिल बाग़-बाग़ मुझे करना पड़ा

शनिवार, 11 अक्टूबर 2014

व्रत है या ये कोई पर्व है

आसमाँ में चन्दा ,झिलमिल तारों की छाया 
रात के अन्तिम पहर में जग कर 
बैठ सुहागन सर्घी करती
अन्न दही फल मेवा मिष्ठान और नारियल 
शगुनों भरी है थाली 
करवा-चौथ का व्रत है साजन
अपने प्रिय की है वो प्रेयसि 
नस-नस में रँग भरती 
  
निर्जल व्रत है , सोलह श्रृंगार कर 
सज-धज कर और थाली सजा कर 
सारी सुहागनें बैठ कथा हैं सुनतीं 
चाँद की पूजा करने के बाद ही 
मुँह में ग्रास वो रखतीं 
आशीर्वाद बड़ों से लेकर ,
सीने में खुशियाँ भरतीं 

व्रत है या ये कोई पर्व है 
रंगों भरा है मेला 
मन ही मन फिर कह उठतीं हैं 
जन्मों का है साथ सजनवा 
चलो पकड़ कर हाथ सजनवा 
अपने पिया की हैं वो सुहागन 
चाँद भी हामी भरता 
आसमाँ में चन्दा ,झिलमिल तारों की छाया 
आज का सारा उद्यम पिय के नाम वो करतीं 

बुधवार, 17 सितंबर 2014

गैर की तरह

उन्हें ये है ऐतराज़ के हम खुश रहते क्यूँ हैं 
घड़ी-घड़ी रह-रह के यूँ मुस्कराते क्यूँ हैं 

बड़ी मुश्किल से आये हैं इस मुकाम पर 
फिर पुरानी राह हमें वो दिखलाते क्यूँ हैं 

अपने सीने में भी धड़कता है दिल 
हो जा ज़िन्दगी से महरूम बतलाते क्यूँ हैं 

हमें मालूम है दुनिया का चलन 
गैर की तरह वो भी सितम ढाते क्यूँ हैं 

उन्हें मालूम नहीं ,वही मुस्कराते हैं सीने में 
मेरे चेहरे का रँग वही उड़ाते क्यूँ हैं 

सोमवार, 18 अगस्त 2014

ये चाहतों का सफर

ज़िन्दगी एक तन्हा सफ़र है गोया 
हर कदम राह में यार की उठता हो गोया 

उसके आने से महकता है समाँ 
उसकी मेहरबानी भी सँग-सँग हो गोया

करवटें बदलती रहती हूँ मैं 
नीँद उसको भी तो आ गई हो गोया

वक्त के बेरहम हाथों ने बख़्शा किसे 
हर सीने में नमी ही तैरती हो गोया

ये चाहतों का सफर ले आया है 
इक जँग खुद से भी छिड़ी हो गोया

वो मेरा दोस्त है तो दुश्मनी क्यूँ-कर 
दिए के साथ-साथ कोई हवा हो गोया

शुक्रवार, 27 जून 2014

मेरे लई ते राताँ ने सारियाँ

वे चन्ना , किस कम्म दिआं ऐ महल ते माड़ियाँ 
तेरे बाज्यों सब ने विसारिआं 
केहड़े पासेओं दिन ऐ चढ़दा 
मेरे लई ते राताँ ने सारियाँ 

सुंजियाँ मेरियाँ दिल दियाँ राहाँ 
देके विखाली लुक्क गया कोई 
टक्करां मारन अक्खाँ मेरियाँ 

रोंदी होई हस्स पैन्नी हाँ 
किस थां जावाँ रूह पुच्छदी ऐ 
पिंजर मेरा डोराँ तेरियाँ 

गम साथी ने घर मेरा तक्कया 
फुल्ल बहुतेरे खुशबू नदारद 
दुनियावी गल्लाँ मुक्क गइयाँ सारियाँ

वे चन्ना , किस कम्म दिआं ऐ महल ते माड़ियाँ 
तेरे बाज्यों सब ने विसारिआं 
केड़े पासेओं दिन ऐ चढ़दा 
मेरे लई ते राताँ ने सारियाँ