मंगलवार, 14 जून 2011
सब फ़ानी ही लगे
बारूद के ढेर पर कोई कहानी ही लगे
फूलों को बोना भी जरुर
काँटों में इनकी महक ज़िन्दगानी ही लगे
तोड़ कर तारे तो मैं ले आऊँ
जो मेरे हाथ कोई मेहरबानी ही लगे
न आए कोई तो क्या कीजे
दिल जलाना भी नादानी ही लगे
वक्त के हाथ हैं तुरुप के मोहरे
पत्तों की बाज़ी भी आसमानी ही लगे
भस्म कर देती है चिन्गारी भी
राख के ढेर तले आग पुरानी ही लगे
छाछ भी फूँक के ही पीता है
जले दूध के को सब फ़ानी ही लगे
शुक्रवार, 20 मई 2011
धूप छाया भी सुलगते ही मिले
इमारत के बुर्ज हिलते मिले
न गुजरें दिन न गुजरें रातें
हाथों से उम्र फिसलती मिले
या खुदा , आदमी का ऐसा भी मुकद्दर न लिख
गुजर जाए वक्त और आदमी खड़ा ही मिले
जीने के बहाने थोड़े मिले
मरने के बहाने बहुतेरे मिले
प्यास उम्रों से लगी है
धूप छाया भी सुलगते ही मिले
कुँए-तालाब , पेड़-पौधे
मौसम की राह तकते ही मिले
भला बताओ वो दोस्त कैसे हुए
फासले रख के जो दोस्तों से मिले
छिपी हैं वेदनाएँ ही संवेदनाओं में
इसीलिए हर कोई अक्सर हिलता ही मिले
शुक्रवार, 6 मई 2011
रुके रुके से दिन
रुके रुके से दिन परछाइयाँ चलती हुईं
धू-धू कर जल उठीं अमराइयाँ कितनी
स्कैच बना कर खुदा रँग भरना भूल गया
काले सफ़ेद वर्कों में रुसवाइयाँ कितनी
बहला रहे हैं खुद को आँकड़ों के खेल में
जिन्दगी की दौड़ में गहराइयाँ कितनी
सँकरे रास्ते भी देते हैं पता मंजिल का
चल चल कर बनती हैं पगडंडियाँ कितनी
अपनों के बिखर जाने से डर लगता है
भले ही दूर हों मगर हैं नजदीकियाँ कितनी
तगाफुल होते ही रहते हैं राहे इश्क में
बचे साबुत तो देखेंगे के हैं बरबादियाँ कितनी
साजिश में दुनिया की खुदा भी था शामिल
शिकायत कैसे करें , हैं उसकी मेहरबानियाँ कितनी
मंगलवार, 26 अप्रैल 2011
कैसे जिया जाता है
आ तुझे बता दूँ मैं , कि कैसे जिया जाता है
कैसे पलकों पे , सपनों को सिया जाता है
रुसवाई कैसी भी हो , जीवन से नहीं बढ़ कर है
लम्हे लम्हे को पी कर के , उत्सव को जिया जाता है
रूठे खुद से हो , सपनों की दुहाई देते हो
चाहत के रेशमी धागों से , जख्मों को सिया जाता है
जोश और जुनूनों को , किनारों का पहनावा दे कर
रँग और नूर की बरसातों से , खुशबू को पिया जाता है
आ तुझे बता दूँ मैं , कि कैसे जिया जाता है
कैसे पलकों पे , सपनों को सिया जाता है
गुरुवार, 14 अप्रैल 2011
कोई अब तक खड़ा है
तुम्हारा इन्तिज़ार अब तक हरा है
सूखी नहीं हैं टहनियाँ कोई अब तक खड़ा है
मौसम कई आए गए किसको पता
कोई अब तक तन्हा बड़ा है
मत बताना नहीं आयेगी कोई चिट्ठी
इतनी सी खबर में भी तूफ़ान बड़ा है
लम्हा लम्हा रौशन हैं बहारें देखो
ज़िन्दगी ये भी तेरा अहसान बड़ा है
चन्दा भी रातों को जगा है
रोज घटता बढ़ता अरमान बड़ा है
कोपलें खिल न सकीं मौसम की मेहरबानी से
धरती के सीने में अहसास बड़ा है
वफ़ा ज़फ़ा एक ही सिक्के के दो पहलू
सगा नहीं है कोई फिर भी विष्वास बड़ा है
टंगा हुआ है कोई आसमाँ के पहलू में
वजह कोई न थी तो क्यूँ किस्मत से लड़ा है
गुरुवार, 31 मार्च 2011
आशिक का ही मुहँ देखा किये
शेरों और गजलों में हम जिन्दा रहे
हर कदम पर खाई थी रुसवाई थी
गिर गिर कर उठे हम डूबते उतराते रहे
जवाकुसुमों का अपना क्या रँग और क्या है महक
अपनी खुशबू से बेखबर उड़ते रहे खोते रहे
बेलों का अपना है क्या वजूद
तनों से लिपटे रहे सहारे को लड़खड़ाते रहे
उसके चेहरे का रँग ही सजता रहा
अपनी तन्हाईयों से हम घबराते रहे
जिन्दगी भर आशिक का ही मुहँ देखा किये
शेरों और गजलों में हम जिन्दा रहे
यहाँ क्लिक कर के मेरी आवाज में सुन सकते हैं .....
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शुक्रवार, 25 मार्च 2011
सिपह-सालार नहीं हिलता
गैर के खेमे में
अपना कोई वश नहीं चलता
हजार बातेँ हैं
दिल कहीं नहीं लगता
नन्हा कोई पौधा
मिट्टी की कोख में पलता
अच्छे होने की निशानी क्या है
साथ कोई नहीं चलता
साथ चलने से दब जाएगा वजूद
अना का कोई किनारा नहीं मिलता
इम्तिहान है ज़िन्दगी
नतीजा कुछ भी मिलता
हौसला है तो जँग जीती सी
इसी दम पे सिपह-सालार नहीं हिलता

