मंगलवार, 12 मार्च 2013

दिन की अहमियत

रात का मुँह देखा तो जानी दिन की अहमियत 
दिल जला कर ही सही , कलम की रौशनाई हुई 

लहरें ही तो होती हैं शान समन्दर की 
ज़िन्दा हैं तो हलचल है , वरना मुर्दों की बस्ती हुई 

रग-रग में समाया है अरमाँ बन कर 
ज़ुदा करते नहीं बनता , खूं जैसी पहचान हुई 

पकड़ लेता है कलम जब-जब समन्दर 
बह जाता है हर कोई , बौनों सी हस्ती हुई 

ज़िन्दगी होती है सहरा के किनारों में भी 
नमी सारी तप कर , सूरज की नजर हुई 

5 टिप्‍पणियां:

  1. लहरें ही तो होती हैं शान समन्दर की
    ज़िन्दा हैं तो हलचल है , वरना मुर्दों की बस्ती हुई .
    बहुत खूब

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  2. ज़िन्दगी होती है सहरा के किनारों में भी
    नमी सारी तप कर , सूरज की नजर हुई

    सुंदर भावपूर्ण चिंतन.

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  3. ज़िन्दगी होती है सहरा के किनारों में भी
    नमी सारी तप कर , सूरज की नजर हुई

    वाह! सच बहुत खूब लिखा है.

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  4. अहसास महसूस करने वाला मिला,सुकून मिला
    वरना जिन्दगी हमारी भी बस यूँ ही बसर हुई .....
    शुभकामनायें!

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मैं भी औरों की तरह , खुशफहमियों का हूँ स्वागत करती
मेरे क़दमों में भी , यही तो हैं हौसलों का दम भरतीं