चार किताबें पढ़ कर हम-तुम , क्या विरले हो जाएँगे
मिटा न पाए मन का अँधेरा, तो क्या उजले हो जाएँगे
एक अना की ख़ातिर हम तुम ,लड़ लेते बेबात
मार के डुबकी देखो अन्दर , कितने उथले हो जाएँगे
कोई छोटा बड़ा न जग में ,
ढाई आखर प्रेम ही सच है ,बाक़ी सारे जुमले हो जाएँगे
सीरत सदा महकती रहती
ख़ुशबू का अन्दाज है अपना ,वरना नक़ली गमले हो जाएँगे
जितना जियें , सच्चा जियें
भरपूर जियें , जी खोल जियें
वरना कंगले हो जाएँगे
लिखने वाले ने लिख डालीं तक़दीरें
हम भी कुछ ऐसा लिख डालें , कुछ यादों में संभले रह जाएँगे
वरना यादों की तस्वीर में हम-तुम धुँधले रह जाएँगे


12 टिप्पणियां:
आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द रविवार 07 दिसंबर , 2025 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
लम्बे समय के बाद पढना हुआ आपको ... वैसी हो ताजगी ...
बेहतरीन
सीरत सदा महकती रहती
बहुत खूब
वाह
बहुत ही सुन्दर रचना
बहुत धन्यवाद
बहुत शुक्रिया , ब्लॉगवाणी जब से बंद हुई , ब्लॉगर्स की पोस्ट्स पढ़ने के लिए कोई कॉमन एग्रीगेटर था ही नहीं , अभी एक ये पाँच लिंक्स वाली पोस्ट शुरू हुई है और एक मंच नाम से ब्लॉग द्वारा अनुसरण किये गए ब्लॉग्स की लिस्ट जो साइड में प्रदर्शित है , बस वहीं से पढ़ने का लाभ उठाया जा रहा है ।
बहुत सुंदर रचना
सभी टिप्पणीकर्ताओं को हौसला बढ़ाने के लिए शुक्रिया
"यह कविता बहुत ही सुंदर रचना है, दिल को छू गई।"
इस सहृदयता का बहुत बहुत धन्यवाद
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